परमेश्वर के प्रासंगिक वचन: जीवन-प्रवेश क्या है?

 परमेश्वर के प्रासंगिक वचन: जीवन-प्रवेश क्या है?

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परमेश्वर के प्रासंगिक वचन: जीवन-प्रवेश क्या है

जीवन-प्रवेश क्या है? जीवन-प्रवेश किसी व्यक्ति के जीवन में, उसके कार्यों में, उसके जीवन की दिशा में, और उसकी तलाश के लक्ष्य में होने वाला परिवर्तन है। अतीत में मूर्ख और अज्ञानी रहने, और हमेशा दैहिक विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार काम करने के बाद व्यक्ति अब परमेश्वर के प्रकटनों, सिंचन और पोषण के माध्यम से यह समझ सकता है कि उसे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ऐसा व्यक्ति दैनिक जीवन में, अपने दृष्टिकोणों और स्वयं को संचालित करने की शैली में, और जीवन में अपनी दिशा और लक्ष्यों के बारे में परमेश्वर के वचनों के आधार पर एक परिवर्तन से गुजरा है। यही जीवन-प्रवेश है। जीवन-प्रवेश का क्या आधार है? (परमेश्वर के वचन।) वह मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों और सत्य से संबंधित होता है। जीवन-प्रवेश परमेश्वर के वचनों से अविभाज्य है; वह सत्य से अविभाज्य है। जिन्होंने जीवन-प्रवेश हासिल कर लिया है, उन लोगों में क्या प्रकट होता है? वे जीने के लिए परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करने में सक्षम होते हैं; उनके कार्य, उनका बोलना, समस्याओं के बारे में उनके विचार, दृष्टिकोण, भंगिमाएँ और परिप्रेक्ष्य, सभी परमेश्वर के वचनों और सत्य पर निर्भर होते हैं। ये जीवन-प्रवेश हासिल कर लेने की अभिव्यक्तियाँ हैं।

जीवन में प्रवेश पाने की तलाश करते समय

एक व्यक्ति को कौन-सी मुख्य बात समझनी चाहिए? वह बात है कि, परमेश्वर के कहे गए सारे वचनों में, चाहे वे किसी भी पहलू के विषय में हों, तुम्हें पता लगाना होगा कि लोगों के लिए उसकी अपेक्षाएँ और उसके मानक क्या हैं, और उनसे होकर, तुम्हें अभ्यास का एक मार्ग खोजना होगा। तुम्हें अपने आचरण और दृष्टिकोण की जांच करने के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए, और उनके सन्दर्भ में अपनी स्थितियों और अभिव्यक्तियों की भी जांच करनी चाहिए। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हें इन मानकों द्वारा यह निश्चित करना चाहिए कि तुम चीज़ों को कैसे करोगे, अपने कर्तव्यों को करते समय परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करोगे, और कैसे तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के बिलकुल अनुरूप चल सकते हो। एक ऐसे व्यक्ति बनो जिसके पास सत्य की वास्तविकता हो, ऐसे व्यक्ति नहीं जो स्वयं को केवल शब्दों, सिद्धांतों और धार्मिक मतों से लैस करता हो। आध्यात्मिकता का ढ़ोंग न करो; एक नकली आध्यात्मिक व्यक्ति न बनो। तुम्हें अभ्यास करने पर, और अपनी स्थितियों की तुलना और उन पर चिंतन करने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल करने पर, ध्यान देना चाहिए, और तब तुम उस दृष्टिकोण और रवैये को बदल डालो जिससे तुम हर तरह की परिस्थिति में बर्ताव करते हो। अंततः, 

तुम हर परिस्थिति में परमेश्वर का आदर कर सकोगे, और तब तुम फिर कभी अपने ही विचारों का न तो अनुसरण करोगे न उसके अनुसार उतावलेपन से काम न करोगे, अपनी ही इच्छाओं के अनुसार चीज़ों को न करोगे, या एक भ्रष्ट स्वभाव के तहत न जिओगे। इसकी जगह, तुम्हारे सभी काम और तुम्हारे सभी शब्द परमेश्वर के कथनों पर आधारित होंगे और सत्य के अनुरूप होंगे; इस तरह, क्रमशः तुममें परमेश्वर के लिए सम्मान जागेगा। सत्य की तलाश करते समय एक परमेश्वर-भीरु हृदय उत्पन्न होता है; यह संयम से नहीं आता। संयम से सिर्फ़ एक तरह का आचरण पैदा होता है, जो कि एक प्रकार का बाहरी अवरोध है। परमेश्वर के लिए एक सच्चा आदर तब आता है—परमेश्वर में विश्वास करने के दौरान—जब हम सच्चाई के अनुसार अभ्यास करें, क्रमशः अपने भ्रष्ट स्वभाव को कम करें और अपनी स्थितियों को धीरे-धीरे सुधारें ताकि हम परमेश्वर के सामने अक्सर आ सकें; यही वह प्रक्रिया है जिससे सच्चा आदर उत्पन्न होता है। जब वह होता है तब तुम जान पाओगे कि परमेश्वर का आदर करने का क्या अर्थ है और यह कैसा महसूस होता है, और तब तुम जानोगे कि कैसा रवैया, कैसी मनःस्थिति और कैसा स्वभाव लोगों के पास होना चाहिए, इसके पहले कि वे वास्तव में परमेश्वर-भीरु हो सकें और परमेश्वर के प्रति आदर दिखा सकें।

जीवन में तुम्हारे प्रवेश में, कम से कम तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए तड़पनाचाहिए, तुम्हें सच्चाई में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में गहरे प्रवेश का अनुसरण करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है और तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख होना शुरू हो चुका है।

जीवन में प्रवेश का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना मन लगाना है और दूसरा कदम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है, जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करने से मिलना है? यह है एक गहरे सत्य के लिए तड़प, खोज और अन्वेषण करना और सकारात्मक तरीके से परमेश्वर के साथ सहयोग के लिए सक्षमहोना। आज तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, जिसका अर्थ है कि तुम्हारी खोज, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों से तुम्हारे समागम का एक उद्देश्य है और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करते हो—केवल यही है परमेश्वर के साथ सहयोग करना। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न प्रार्थना करते हो और न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे भीतर सहयोग का अंश तक नहीं और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं: "सब कुछ परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया तो मनुष्य कैसे कर सकता था?" परमेश्वर का कार्य सामान्य है और ज़रा भी अलौकिक नहीं है और यह केवल तुम्हारी सक्रिय खोज के माध्यम से ही पवित्र आत्मा कार्य करती है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के लिए कार्य करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग द्वारा परमेश्वर का स्पर्श हासिल करने की तलाश कर सकते हो? प्रार्थना के माध्यम से और परमेश्वर के करीब आकर। मगर याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, यह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर खड़ा होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर द्वारा अक्सर छू लिए जाते हो, तो तुम शरीर के गुलाम नहीं बनते: पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बेड़ियों में बांधने में असमर्थ रहते हैं और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहता है।

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