जीवन-प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौन-सा है

जीवन-प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौन-सा है? 


bible verse for todayजीवन-प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौन-सा है
जीवन-प्रवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु कौन-सा है


सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं

अपने कर्तव्य पर टिके रहो—वह पहले आता है। यह सब अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से ही शुरू होता है। तुम्हारा जीवन-प्रवेश तुम्हारे कर्तव्य का निर्वाह करने से शुरू होता है, और जीवन-प्रवेश के माध्यम से तुम थोड़ा-थोड़ा करके सत्य को समझने लगते हो, और सत्य को प्राप्त करने लगते हो। तुम्हें आध्यात्मिक कद मिल जाता है, तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे विकसित होने लगता है, तुम्हें सत्य के सच्चे अनुभव होने लगते हैं, और बाद में तुम अभ्यास के विभिन्न सिद्धांत समझने लगते हो, और किसी भी व्यक्ति, चीज या पदार्थ से विवश या परेशान नहीं होते; इस तरह, तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के सम्मुख जीने लगते हो। अगर तुम किसी भी व्यक्ति, चीज या मामले से परेशान नहीं होते हो, और सत्य का अनुभव कर पाते हो, तो जैसे-जैसे तुम्हारे अनुभव समृद्ध होते जाएँगे, तुम परमेश्वर की गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाओगे। जब तुम परमेश्वर की गवाही देने में ज्यादा सक्षम हो जाओगे, तो तुम धीरे-धीरे उपयोगी व्यक्ति बन जाओगे; जब तुम उपयोगी व्यक्ति बन जाओगे, तो परमेश्वर के घर में तुम्हारा एक स्थान होगा, तुम दृढ रहोगे, और तुम एक अच्छे व्यक्ति, एक सच्चे व्यक्ति बन जाओगे। तब तुम उस सबके योग्य हो जाओगे, जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करता है।


जीवन प्रवेश का अनुसरण करते हुए, एक व्यक्ति को रोजमर्रा के जीवन में सामने आने वाले हर मामले से अपने शब्दों और कर्मों, सोच और विचारों की जांच करनी चाहिए, और अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए; इसके बाद, सत्य से उनकी तुलना करनी चाहिए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, और जिन सत्यों को समझा है उनकी सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए। सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के दौरान, एक व्यक्ति को अपनी अवस्थाओं को समझना चाहिए, और परमेश्वर के सामने प्रार्थना और विनती करने के लिए अक्सर आना चाहिए। उसे खुले दिल से भाइयों और बहनों के साथ अक्सर सहभागिता भी करनी चाहिए, सत्य-वास्तविकता के प्रवेश करने के मार्ग की तलाश करनी चाहिए, और सत्य-सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए। अंततः, उसे पता चलेगा कि रोजमर्रा की जिंदगी में कौन-कौन से स्वभाव वह प्रकट करता है, परमेश्वर को उनसे खुशी मिलती है या नहीं, उसके अभ्यास का रास्ता सही है या नहीं, उसने आत्म-परीक्षण के माध्यम से स्वयं के भीतर पाई गई अवस्थाओं की तुलना परमेश्वर के वचनों के साथ की है या नहीं, उसने इनकी सही-सही जाँच की या नहीं, वे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं या नहीं, और उसने सच में कोई उपलब्धि हासिल की है या नहीं और उन परमेश्वर के वचनों के अनुरूप अवस्थाओं में सकारात्मक प्रवेश किया है या नहीं। जब तुम इन अवस्थाओं में, इन स्थितियों में अक्सर रहोगे, तो धीरे-धीरे, तुम्हें कुछ सत्यों और अपनी व्यावहारिक अवस्थाओं की बुनियादी समझ हासिल हो जाएगी। और जब कोई व्यक्ति इन अवस्थाओं और सत्य के सभी पहलुओं की बुनियादी समझ पा लेता है, तो वह भीतर से समृद्ध और विपुल हो जाता है; फिर वह संवेदनाशून्य, मंदबुद्धि, दरिद्र और दयनीय नहीं रह जाता।


परमेश्वर में अपनी आस्था में विकास प्राप्त करने की मुख्य कुँजी है यह जानना कि परमेश्वर तुम्हारे अनुभव में क्या कार्य करता है, परमेश्वर की मनोहरता का अवलोकन करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की सारी व्यवस्थाओं को मान लो, परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर गढ़ लो ताकि वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ और फलस्वरूप परमेश्वर को संतुष्ट करें। अगर तुम्हारी आस्था मूर्खतापूर्ण आस्था है, अगर तुम आध्यात्मिक बातों और अपने जीवन-स्वभाव में आए बदलावों पर कोई ध्यान नहीं देते, अगर तुम सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओगे? अगर तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर क्या चाहता है, तो तुम अनुभव करने के नाकाबिल होगे, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो, तो तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे तुम्हारे अंदर क्या प्रभाव पैदा कर रहे हैं, ताकि तुम परमेश्वर को उसके वचनों से जान सको। अगर तुम मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि उनका अनुभव कैसे करना है, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम आध्यात्मिक मामलों से अनजान हो? इस समय, अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर पाने में असमर्थ हैं और इस तरह वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। क्या यह उनका अपने अभ्यास में विफल होना नहीं है? अगर वे ऐसे ही करते रहे, तो वे किस मुकाम पर जाकर चीज़ों को उनकी पूर्णता में अनुभव कर पाने में सक्षम होंगे और अपने जीवन में विकास प्राप्त कर पाएँगे। क्या यह महज़ खोखली बातें करना नहीं है? तुम लोगों में से बहुत लोग ऐसे हैं जो सिद्धांत पर ध्यान देते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों का कोई ज्ञान नहीं है, और फिर भी वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनका कोई बड़ा इस्तेमाल करे और उन्हें आशीष दे। यह एकदम अवास्तविक बात है! इस तरह, तुम लोगों को इस नाकामी का अंत करना चाहिए, ताकि तुम सब अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग में प्रवेश कर सको, वास्तविक अनुभव ले सको  सचमुच परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सको।

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