नकारात्मकता को हल कैसे करें:- Daily word of god life entry

नकारात्मकता को हल कैसे करें

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नकारात्मकता को हल कैसे करें:- Daily word of god life entry 


परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोग अ‍पने भीतर, गहराई में कुछ बुरी मनोदशा पाले रहते हैं, जैसे नकारात्मकता, दुर्बलता और अवसाद या भंगुरता; या लगातार हावी रहने वाली कोई तुच्छ मंशा; या हमेशा अपनी प्रतिष्ठा, स्वार्थ और अपने हितों को लेकर चिंता में घुलते रहते हैं; या फिर वे खुद को अयोग्य समझते हैं और कुछ विशिष्ट नकारात्मक मनोदशा में रहते हैं। जब तुम लगातार ऐसी मनोदशा में रहते हो, तो तुम्हारे लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर तुम्हें पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में मुश्किल होती है, तो तुम्हारे अंदर बहुत कम सकारात्मक भावनाएँ होंगी और तुम्हारे लिए सत्य को प्राप्त करना कठिन होगा। लोग संयम के अभ्यास के लिए हमेशा अपनी इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहकर, खुद को किसी न किसी तरीके से अंकुश में रखते हैं, पर फिर भी वे उन नकारात्मक या प्रतिकूल मनोदशा से खुद को मुक्त नहीं कर पाते। इसके पीछे आंशिक रूप से मानवीय कारण हैं; लोग अपने अनुकूल अभ्यास का कोई मार्ग नहीं ढूंढ पाते। दूसरा कारण है—और यह भी एक बड़ा कारण है—कि लोग हमेशा इन नकारात्मक, पतनशील एवं विकृत मनोदशा में फंस जाते हैं और पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर पाता। अगर कभी-कभार पवित्र आत्मा उन्हें कुछ प्रबुद्धता देता भी है तो भी वह उनमें कोई बड़ा कार्य नहीं कर पाता। इसलिए लोगों को कोई कदम उठाने के लिए कड़ा प्रयास करना पड़ता है और उनके लिए कुछ भी देखना या समझना बहुत मुश्किल होता है। तुम्हारे लिए प्रबुद्धता और प्रकाशन प्राप्त करना दूभर है और प्रकाश प्राप्त करना तो और भी दूभर है, क्योंकि तुम्हारे भीतर बहुत सारी नकारात्मक और प्रतिकूल चीजों ने तमाम जगह घेर रखी है। अगर कोई व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध न किया जा सके और वह पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त न कर पाए, तो वह इस मनोदशा से छुटकारा नहीं पा सकता या इस नकारात्मक मनोदशा को बदल नहीं सकता; पवित्र आत्मा कार्य नहीं करता और तुम्हें आगे का रास्ता नहीं मिल पाता। इन दोनों कारणों से, तुम्हारे लिए एक सकारात्मक, सामान्य मनोदशा प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है। भले ही तुम बहुत कुछ सहन कर सकते हो, अपने कर्तव्यों के पालन में कड़ी मेहनत कर सकते हो, भले ही तुमने बहुत अधिक प्रयास किया है और अपना घर-बार और काम-धंधा तक छोड़ दिया है और हर चीज का पूरी तरह से त्याग कर दिया है, पर तुम्हारी अंदरूनी दशा अब भी नहीं बदली है। बहुत सारी उलझनें अब भी तुम्हें अपनी लपेट में लिए हुए हैं और तुम्हें सत्य का अभ्यास करने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने से रोकती हैं। तुम्हारे अंदर बहुत सारी चीजों ने जगह घेर रखी है : निजी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, जीवन-दर्शन, साथ ही, नकारात्मक चीजें, स्वार्थ, निजी-हित, प्रतिष्ठा से जुड़ी चिंताएँ और दूसरों के साथ विवाद। लोगों के भीतर कुछ भी सकारात्मक नहीं होता। उनके दिमाग नकारात्मक और प्रतिकूल विचारों से भरे रहते हैं, इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता। उनके दिल शैतानी चीजों से भरे हुए हैं और वे उन्हीं के कब्जे में हैं। अगर तुम इन चीजों को दूर नहीं हटाओगे, अगर तुम खुद को इन दशाओं से मुक्त नहीं कर सकते, अगर तुम एक बच्चे की तरह सच्चे नहीं बन सकते—मासूम, जीवंत, निश्छल, प्रामाणिक और विशुद्ध—परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आ सकते और उसके सम्मुख नहीं आ सकते, तो तुम्हारे लिए सत्य प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा।


हर किसी के सामने ऐसे क्षण आते हैं जब वे निष्क्रिय होते हैं, चाहे वे अकसर आते हों या कभी-कभार, गंभीर हों या मामूली, चाहे कोई स्पष्ट तथ्य हो जो उन्हें निष्क्रिय बनाता है या कोई स्पष्ट तथ्य न हो, लेकिन केवल कुछ विचार, भाव, मत, कल्पनाएँ और धारणाएँ उन्हें निष्क्रियता में डुबो देती हैं। जो भी मामला हो, जो भी स्थिति हो या उनकी जो भी अवस्था हो, अगर लोग भ्रष्ट स्वभाव में रहते हैं, तो ऐसे क्षण आएँगे जब वे कुछ निष्क्रिय अवस्थाओं में डूब जाएँगे। बेशक, अगर लोगों के पास आध्यात्मिक कद हो और वे सत्य का अनुसरण करते हों, तो उनकी निष्क्रिय अवस्था अल्पकालिक होगी, और जैसे-जैसे उनका आध्यात्मिक कद बढ़ेगा और वे सत्य का अनुसरण करेंगे, वह धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी। अगर लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो उनकी निष्क्रिय अवस्थाएँ, निष्क्रिय मनोदशाएँ, और निष्क्रिय विचार और मनोवृत्तियाँ और अधिक प्रचुर हो जाएँगी, और उनका जमावड़ा और संचय होता जाएगा। इसलिए निष्क्रियता का समाधान करना बहुत जरूरी है। तुम इसे कैसे लेते हो, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। चाहे कुछ भी हो, निष्क्रियता के प्रति तुम्हारे रवैये में निष्क्रिय तरीके, या प्रतिरोध और टकराव की मनोस्थिति शामिल नहीं होनी चाहिए; इसके बजाय, तुम्हें उससे सत्य की तलाश करते हुए निपटना चाहिए। कुछ विशिष्ट क्षेत्र तुम्हें निष्क्रियता में डुबोने में जितने अधिक सक्षम होते हैं, और जितने अधिक क्षेत्र या मामले परमेश्वर के प्रति अवज्ञा, असंतोष, शिकायतें आदि पैदा करते हैं, और तुम्हें उसके खिलाफ शोर मचाने के लिए उकसाते हैं, उतना ही अधिक तुम्हें परमेश्वर के सामने आना चाहिए और सत्य की खोज करनी चाहिए। अगर तुम किसी एक बात, किसी एक वाक्य या किसी एक विचार या मत के कारण निष्क्रियता में डूबे हो, तो यह साबित करता है कि इस मामले का तुम्हारा ज्ञान विकृत है, कि तुम्हारे पास धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, और यह कि इस मामले के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण निश्चित रूप से सत्य के साथ असंगत है। ऐसे समय में तुम्हें मामले का सही ढंग से सामना करने, उसे यथाशीघ्र और तत्परता से ठीक करने का प्रयास करने, अपने-आपको इन धारणाओं से लड़खड़ाने और गुमराह न होने देने, और परमेश्वर के प्रति अवज्ञा, असंतोष और शिकायतें करने की स्थिति में न डूबने देने की आवश्यकता होती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि निष्क्रियता को तुरंत और पूरी तरह से हल किया जाए। बेशक, चाहे कोई भी साधन या पद्धति हो, सबसे अच्छा तरीका केवल सत्य की तलाश करना, परमेश्वर के वचनों को अधिक पढ़ना, और परमेश्वर की प्रबुद्धता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के सामने आना है; कभी-कभी हो सकता है कि तुम अपने विचार और भाव तुरंत बदलने में सक्षम न हो पाओ, लेकिन कम-से-कम तुम्हें यह पता चल जाएगा कि तुम गलत हो, और तुम्हारे ये विचार विकृत हैं। इसका न्यूनतम प्रभाव यह होगा कि ये गलत विचार और भाव अपने कर्तव्य-पालन के प्रति तुम्हारे समर्पण को प्रभावित नहीं करेंगे, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध को प्रभावित नहीं करेंगे, और तुम्हें प्रार्थना करने और अपना दिल खोलने के लिए परमेश्वर के सामने आने से नहीं रोकेंगे। कम-से-कम ये प्रभाव प्राप्त करने की आवश्यकता तो है ही। अगर तुम निष्क्रियता में, और परमेश्वर के प्रति अवज्ञा, असंतोष और शिकायतों की मनोदशा या स्थिति में डूबे हो, और चाहे तुम दूसरों के साथ जैसे भी संगति करते हो या इसे अनदेखा करने का प्रयास करते हो, अगर तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ना या प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आना नहीं चाहते, तो समस्या गंभीर हो जाएगी। तुम कहते हो, "मैंने अपना कर्तव्य पूरा करने में देरी नहीं की, और मैंने उसे सच्चे दिल से किया, मैं बिलकुल अंत तक समर्पित रहूँगा।" क्या यह कथन सत्य है? अगर तुममें अनसुलझी निष्क्रियता है, तो क्या वह अपने-आप कम हो जाएगी? क्या निष्क्रियता अपने-आप गायब हो सकती है? अगर तुम इस निष्क्रियता को हल करने के तरीके के रूप में सत्य की तुरंत खोज नहीं करते, तो वह बढ़ती जाएगी, और वह केवल और ज्यादा गंभीर ही हो सकती है। उसके परिणाम केवल और ज्यादा गंभीर ही हो सकते हैं, वह सकारात्मक दिशा में नहीं, बल्कि एक घातक दिशा में विकसित होगी। और इसलिए, जब निष्क्रियता प्रकट हो, तो तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए और उसे जल्द-से-जल्द हल करना चाहिए। यह एक विकट मामला है।


परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से पहले लोग कई अवस्थाओं से गुजर चुके होते हैं। उदाहरण के लिए, लोगों में अकसर एक नकारात्मक स्थिति देखी जाती है : जब दूसरे लोग ज्यादा उत्पादक ढंग से अपने कर्तव्य निभाते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं; जब दूसरों के परिवार उनके परिवारों से अधिक एकजुट होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं; जब दूसरों की स्थितियाँ उनकी स्थितियों से बेहतर होती हैं या जब दूसरे उनसे ज्यादा सक्षम होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं; और जब उन्हें थोड़ा जल्दी जगा दिया जाता है, जब उनके कर्तव्य थकाऊ होते हैं और जब वे थकाऊ नहीं होते तब भी, वे नकारात्मक हो जाते हैं। चाहे कुछ भी हो, वे नकारात्मक ही रहते हैं। यदि ऐसे लोग खोजने में विशेष प्रयास करते हैं, और विशेष रूप से कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं, और यदि उनमें कुछ क्षमता होती है और वे कुछ मात्रा में व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम होते हैं, तब अपनी धारणाओं के कारण दूसरे इन लोगों के बारे में कह सकते हैं, "कितने शर्म की बात है कि ये लोग हमेशा नकारात्मक रहते हैं। क्या परमेश्वर को इन लोगों के प्रति थोड़ा पक्षपात दिखाकर इन्हें नकारात्मक होने से बचाना नहीं चाहिए, ताकि ये अपनी नकारात्मकता से उबर जाएँ? परमेश्वर अपना काम क्यों नहीं कर रहा?" परमेश्वर ऐसे लोगों का क्या करता है? उनके प्रति उसका क्या दृष्टिकोण होता है? वह उन्हें अनुशासित नहीं करता, न ही वह उनसे निपटता या उनकी काट-छाँट करता है; वह बस उन्हें दरकिनार कर देता है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यदि तुम हमेशा नकारात्मक रहते हो और परमेश्वर द्वारा किए गए किसी भी काम से संतुष्ट नहीं होते, तो वह तुम्हें कहीं पटककर तुमसे इंतजार करवाएगा। पवित्र आत्मा निरर्थक काम नहीं करता। कुछ लोग कहते हैं, "यदि परमेश्वर ऐसा नहीं करता, तो इसका मतलब है कि वह प्रेम नहीं करता!" परमेश्वर इस ढंग से प्रेम व्यक्त नहीं करता। नकारात्मकता का मतलब है कि लोगों के भीतर कोई समस्या है : वे सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते और वे परमेश्वर के हर काम से लगातार असंतुष्ट बने रहते हैं; इसके अलावा, वे सत्य की जरा-सी भी खोज नहीं करते और न ही उसे व्यवहार में लाते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति प्रतिक्रियाशील क्यों रहेगा? क्या वे विवेकशून्य नहीं हैं? ऐसे विवेकशून्य लोगों के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया होता है? वह उन्हें दरकिनार करके अनदेखा कर देता है। तुम जैसा चाहे, कर सकते हो, और यदि चाहो तो विश्वास कर सकते हो; यदि तुम विश्वास करते हो और खोज करते हो, तो तुम प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के साथ उचित व्यवहार करता है। यदि तुम्हारा दृष्टिकोण सत्य को स्वीकार न करने और समर्पित न होने का है, और यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हो, तो तुम चाहे जिसमें विश्वास करो; साथ ही, यदि तुम छोड़ना चाहो, तो तुम तुरंत ऐसा कर सकते हो। यदि तुम अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते, तो तुम कुछ भी करो, लेकिन कोई शर्मनाक दृश्य निर्मित न करो या अपने को ज्यादा फन्ने खाँ मत समझो, बल्कि तुरंत छोड़ दो, और जहाँ जाना चाहो जाओ। परमेश्वर ऐसे लोगों से रुकने का आग्रह नहीं करता। यही उसका रवैया है। यदि तुम—जो स्पष्ट रूप से एक सृजित प्राणी है—एक सृजित प्राणी की तरह व्यवहार नहीं करते, बल्कि हमेशा एक महादूत बनना चाहते हो, तो क्या परमेश्वर तुम पर ध्यान दे सकता है? यदि तुम—जो स्पष्ट रूप से एक साधारण व्यक्ति है—हमेशा विशेष और तरजीही व्यवहार चाहते हो, और हैसियत और साख वाला व्यक्ति बनना चाहते हो, जो सभी चीजों में दूसरों से अधिक उत्कृष्ट होता है, तो तुम अनुचित हो और तुममें समझ का अभाव है। परमेश्वर उन लोगों को कैसे देखता है, जिनमें समझ का अभाव होता है? उनके बारे में उसका आकलन क्या होता है? ऐसे लोग विवेकशून्य होते हैं!


परमेश्वर द्वारा लोगों में किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग हेतु उपयुक्त बनाने के लिए है। अभी तुम सभी जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह है रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना कि कोई नई चीज़ या रुझान है या नहीं, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे, क्योंकि वे उनके कार्य से थक गए हैं। वे केवल उन वचनों को सुनना चाहते हैं, जो वह आशीष देने के लिए बोलता है, और वे उसके न्याय और ताड़ना के वचनों को सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह जानबूझकर मानवजाति पर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, जो मनुष्य को जीवन देता है, और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।


चाहे बड़े मामले आएँ या छोटे, तुम हमेशा नकारात्मक और कमज़ोर होते हो, और तुम कोई गवाही नहीं देते। व्यक्ति को जो कार्य अथवा सहयोग करना चाहिए, तुम वह करने में विफल रहते हो, जिससे यह साबित होता है कि तुम्हारे दिल में न तो परमेश्वर है और न ही सत्य। आओ, फ़िलहाल हम इस बात पर ध्यान न दें कि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कैसे द्रवित करता है। परमेश्वर के कार्य के अपने वर्षों के अनुभव मात्र के बल पर, बहुत-सी सच्चाइयों को सुनकर, और थोड़े विवेक और दृढ़ संयम के साथ, उन्हें निम्नतम मानक पूरा करने में उन्हें सक्षम होना चाहिए, और उस तरह सुन्न और कमजोर नहीं होना चाहिए, जिस तरह वे अभी हैं। यह एक अविश्वसनीय बात है। यह स्पष्ट है कि तुम इन पिछले कुछ वर्षों में संभ्रमित हो गए हो—नहीं तो तुम ऐसे सुन्न और सुस्त क्यों होते, जैसे तुम हो? सच तो यह है कि तुमने यह सोचकर खुद को सीमांकित कर लिया है, "मैं ठीक नहीं हूँ—मैं अत्यधिक भ्रष्ट हूँ। यह ऐसा ही है, और मुझे बस इसके साथ ही रहना होगा!" तुमने अभी तक अपनी खोज का प्रयास नहीं किया है, और तुम कहते हो, "यही मेरी चुनौती है। मुझे तुम बस घर भेज सकते हो!" यह बकवास नहीं, तो क्या है? यह केवल जिम्मेदारी से कतराना और बचना है! यदि तुम्हारे पास थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक है, तो तुम्हें वह ठीक से पूरा करना चाहिए, जो तुम्हें करना है और जो तुम्हारा ध्येय है; पलायनवादी होना एक भयानक बात है और परमेश्वर के साथ विश्वासघात है। सत्य का अनुसरण करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, और जो लोग बहुत अधिक नकारात्मक या कमज़ोर होते हैं, वे कुछ भी संपन्न नहीं करेंगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, और, यदि वे सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं और स्वभावगत बदलाव हासिल करना चाहते हैं, तो उनके लिए अभी भी उम्मीद कम है। केवल वे, जो दृढ़-संकल्प हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, ही उसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत


जब लोग कठिनाइयों का सामना करते हैं या जब वे काटे-छाँटे जाते हैं और उनके साथ निपटा जाता है या जब वे विफल होते हैं और गिरते हैं, तब वे नकारात्मक होने से बच सकते हैं। इसका प्राथमिक कारण क्या है? वह यह है कि वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं। सत्य को स्वीकार करने में सक्षम होने से वे नकारात्मक होना बंद कर देते हैं। यदि वे सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, हमेशा अपने भीतर कठिनाइयाँ पालते हैं और हमेशा उनका हल निकालने में असफल रहते हैं, तो वे हमेशा नकारात्मक ही रहेंगे; इसका संबंध उनकी सत्य की समझ से है। कुछ लोग जो नकारात्मक हो गए हैं, उनके साथ संगति करने पर वे कहते हैं, "मेरे साथ संगति मत करो, मैं सब समझता हूँ।" क्या वे वास्तव में सब समझते हैं? अगर वे सब कुछ समझते तो क्या वे नकारात्मक होते? यह समझदारी जिसका वे उल्लेख करते हैं, उसमें किस चीज की आवश्यकता है? इसमें आवश्यक है कि वे सिद्धांतों को समझें और वे उनका शाब्दिक अर्थ समझें। हकीकत में, वे सत्य नहीं समझते। सत्य को न समझते हुए भी, वे सिद्धांतों को स्वीकार करने में सक्षम क्यों हैं? (वे परमेश्वर के वचनों को अनुभव नहीं करते, वे उन पर मनन नहीं करते, और न ही वे सत्य खोजते हैं, वे अपने भ्रष्ट स्वभाव की तुलना उनसे नहीं करते।) वास्तव में यही हो रहा है। वे जिन सिद्धांतों को समझते हैं, उन्हें अभ्यास में नहीं लाते, न उसका उपयोग करते हैं; वे केवल उनके बारे में बात करते हैं या दूसरों को उसका उपदेश देते हैं, और फिर वहीं रुक जाते हैं। वे स्वयं सत्य स्वीकार नहीं करते और इस प्रकार वे अपनी नकारात्मक स्थितियों, अपनी कमजोरियों, अपने विद्रोहीपन, अपनी मिथ्या धारणाओं, और अपनी शिकायतों का हल निकालने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। तो फिर, नकारात्मक होने, बदतर हो जाने और खुद को निराशा के हवाले कर देने की समस्या का हल निकालने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? (सत्य को स्वीकार करना) यह अपनी समझ के अनुसार सत्य स्वीकार करना और फिर सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना है। इसे कह तो आसानी से दिया जाता है, लेकिन इसमें प्रवेश करने पर कठिनाइयों से सामना होता है, और यह प्रवेश को कठिन बना देता है। इसलिए तुम्हें यह सच में समझना चाहिये कि सत्य क्या है। यदि तुम हमेशा यही सोचोगे कि तुम समझते हो, लेकिन तुम अपनी कठिनाइयों का समाधान करने में सक्षम नहीं हो, तो इससे सिद्ध होता है कि तुमने सत्य नहीं समझा है। उन सिद्धांतों के आधार पर जो तुम समझते हो, यदि तुम उन्हें सत्य की तरह मानो और स्वयं को उनकी कसौटी पर रखो, और उनको अभ्यास मे लाओ, तो तुम्हारी समस्याएँ हल हो जाएंगी, यदि तुम नकारात्मक या कमजोर हो तब भी कोई समस्या नहीं होगी, और तुम निराश नहीं होगे या ठहर नहीं जाओगे। यही नकारात्मकता का हल निकालने का तरीका है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार बनकर ही लोग वास्तव में खुश हो सकते हैं' से उद्धृत


निष्क्रियता एक ऐसी चीज है, जिससे बचना बहुत मुश्किल है। कोई भी निष्क्रिय हो सकता है। कुछ लोगों में यह लंबे समय तक रहती है, कुछ में थोड़े समय तक। कुछ इस बारे में बात कर सकते हैं कि वे निष्क्रिय क्यों हैं, और कुछ नहीं कर सकते, जिसका कारण बहुत मामूली और अनुल्लेखनीय है, फिर भी यह उन्हें निष्क्रियता में डुबाने में सक्षम होता है। छोटी-सी, महत्वहीन चीजें लोगों को निष्क्रिय बना सकती हैं और उन्हें कुछ दिनों तक हतोत्साहित रख सकती हैं, कुछ खा-पी न पाना, चेहरा लटकाए रखना, किसी के समझाने-बुझाने पर ध्यान न देना—एक शब्द में कहें तो दुखी रहना। ऐसे मामले कैसे सुलझाए जा सकते हैं? अगर कोई बात वास्तव में मामूली और नगण्य है, और कोई ऐसा मामला नहीं है जिसके बारे में तुम बात करना चाहो, और न ही जिसके बारे में अन्य लोग जानना चाहते हों, तो तुम्हें उसे खुद ही दूर कर देना चाहिए, और उसे अन्य लोगों में फैलाते नहीं फिरना चाहिए। जब लोग किसी चीज की तह तक न जा सकें, तो उन्हें कम-से-कम यह ध्यान रखना चाहिए कि वे उसे अन्य लोगों में फैलाते न फिरें। अगर तुम्हारे पास एक ऐसा दिल है, जो परमेश्वर से डरता है और तुम यह स्वीकार करते हो कि तुम परमेश्वर के अनुयायी हो, तो तुम्हें जानबूझकर कोई परेशानी या रुकावट पैदा करने वाला काम नहीं करना चाहिए। यह एक ऐसी चीज है, जिसकी तुम्हें गारंटी देनी चाहिए। अगर तुममें सामान्य मानवता और समझ है, तो तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए—बशर्ते कि तुम कोई मनोरोगी या किसी दानव के वशीभूत नहीं हो, और अपनी मदद नहीं कर सकते हो; जब दानव तुम्हें बोलने के लिए कहे तभी तुम बोलते हो, तुम कुछ नहीं कर पाते हो, यह सब दुष्ट आत्मा द्वारा किया जाता है। अगर तुममें सामान्य मानवता है, तो तुम्हें गारंटी देनी चाहिए कि तुम ऐसा करोगे। और भले ही तुम निष्क्रिय हो, फिर भी तुममें थोड़ी अंतरात्मा होनी चाहिए, तुम्हें अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए, जितना तुम कर सकते हो, जितना तुम चाहते हो, उतना करना चाहिए; केवल ऐसी मानसिकता वाले लोगों को ही अंतरात्मा वाले लोग माना जा सकता है, और भले ही तुम्हारे भीतर निष्क्रियता हो, परमेश्वर इसे तूल नहीं देगा या मामला आगे नहीं बढ़ाएगा। अगर तुम दूसरों से बात करने को तैयार हो, और लोग तुम्हारी मदद करने में सक्षम हों, तो यह सबसे अच्छा है; अगर तुम किसी और को नहीं बताना चाहते, तो धीरे-धीरे उससे अपने आप निपटो। परमेश्वर के साथ संवाद करो और उत्तर खोजो, और धीरे-धीरे अपने-आपको बदलो। अगर तुम बहुत गंभीर और बड़ी चीजों से घिरे हुए हो जो तुम्हें निष्क्रिय बनाती हैं—उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें लगता है कि पद से हटा दिए जाने के बाद तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है, या तुम्हारे साथ गंभीर रूप से काट-छाँट की जाती है और निपटा जाता है और तुम्हें लगता है कि तुम्हें शाप दिया गया है और तुम्हारी निंदा की गई है, या फिर तुम्हारे परिवार में कोई गंभीर घटना हो जाती है और तुम्हारे परिवार के सदस्य और प्रियजन मर जाते हैं, परमेश्वर द्वारा ले लिए जाते हैं, और ये चीजें तुम्हें निष्क्रियता में डुबो देती हैं, और तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में कुछ गलत धारणाएँ और निष्क्रियता घर कर लेती हैं, और तुम व्यथित महसूस करते हो—तो ऐसी परिस्थितियों में तुम्हें क्या करना चाहिए? इसे भी सुलझाया जा सकता है। आध्यात्मिक कद वाले कुछ लोगों को खोजो और उन्हें अपने दिल की बात बताते हुए उनके साथ संगति करो। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है परमेश्वर के सामने आना और सच्चाई के साथ उसे इस सारी निष्क्रियता, कमजोरी, और उन चीजों के बारे में संप्रेषित और सूचित करना, जिन्हें तुम नहीं समझते हो और जो दुर्गम प्रतीत होती हैं—उन्हें छिपाओ मत। कुछ चीजें हैं जो तुम्हारे गले में अटक जाती हैं, जो तुम्हारे लिए अकथनीय हैं : उनके बारे में दूसरों से बात मत करो, दूसरों को परेशान मत करो और उन्हें नुकसान मत पहुँचाओ, बल्कि परमेश्वर के सामने आकर उसे बताओ। तुम्हें परमेश्वर को क्यों बताना चाहिए? निष्क्रियता और कमजोरी के कुछ शब्द लोगों को लड़खड़ा सकते हैं। तुम्हें उन्हें परमेश्वर से कहना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "अगर मैं परमेश्वर से कहूँगा, तो क्या परमेश्वर मेरी निंदा नहीं करेगा?" क्या तुमने बहुत-सी ऐसी चीजें नहीं की हैं, जो पमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं और जिनकी परमेश्वर द्वारा निंदा की जाती है? क्या वह इस एक चीज की परवाह करता है? नहीं करता। तो परमेश्वर जानता है कि तुम क्या सोच रहे हो, चाहे तुम उसके बारे में बताओ या नहीं। अगर तुम उसके बारे में कहीं बात न कर पाओ, या उसे बताने के लिए आध्यात्मिक कद का कोई उपयुक्त व्यक्ति न खोज पाओ, तो सबसे अच्छा है कि तुम परमेश्वर के सामने आओ और उसे सच-सच बताओ। तुम परमेश्वर से अपनी कमजोरियाँ, अवज्ञा, यहाँ तक कि अपनी शिकायतों के बारे में भी कह सकते हो। यहाँ तक कि अगर तुम थोड़ी-सी भड़ास भी निकालना चाहो, तो भी ठीक है—परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता। परमेश्वर इसकी निंदा क्यों नहीं करता? परमेश्वर लोगों का आध्यात्मिक कद जानता है। वह इसे जानता है, भले ही तुम उसे न बताओ। जब तुम परमेश्वर से कहते हो, तो एक ओर तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की आज्ञा मानने का अवसर होता है, तुम्हारे लिए स्वयं को परमेश्वर के सामने खोलकर रख देने का अवसर। दूसरी ओर, यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की मनोवृत्ति को भी इंगित करता है। कम-से-कम, तुम परमेश्वर को यह तो दिखा रहे होते हो कि तुम्हारा दिल उसके लिए खुला हुआ है; बात बस इतनी-सी है कि तुम कमजोर हो, और इस मामले पर काबू पाने के लिए तुम्हारा आध्यात्मिक कद अपर्याप्त है। बस इतनी-सी बात है। तुम्हारा उसकी अवज्ञा करने का कोई इरादा नहीं है, तुम्हारा रवैया आज्ञाकारिता का है; बात सिर्फ इतनी है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, और यह मामला तुम्हारे सहन करने के हिसाब से बहुत बड़ा है। जब तुम परमेश्वर के सामने पूरी तरह से खुल जाते हो और अपने-आपको व्यक्त कर देते हो, भले ही तुम जो कहते हो उसमें कमजोरी और शिकायतें हो—और, विशेष रूप से, बहुत-कुछ निष्क्रिय और नकारात्मक हो—तो एक चीज ऐसी होती है जो सही होती है। वह क्या होती है? तुम यह स्वीकार करते हो कि तुम भ्रष्ट हो, तुम मानते हो कि तुम परमेश्वर के प्राणी हो, तुम परमेश्वर—सृष्टिकर्ता की पहचान को नकारते नहीं हो, और यह मानते हो कि तुम्हारे और परमेश्वर के बीच का संबंध सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता का संबंध है। जब तुम वे चीजें परमेश्वर को सौंप देते हो जिन पर काबू पाना सबसे मुश्किल है, वे चीजें जो तुम्हें कमजोर बना सकती हैं, और तुम परमेश्वर को अपने दिल की हर बात बता देते हो, तो यह तुम्हारे रवैये को दर्शाता है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर को बताने से मेरी निष्क्रियता हल नहीं होती, मैं तब भी उसे दूर नहीं कर पाता।" चिंता मत करो—जैसे-जैसे समय बीतेगा, परमेश्वर तुम्हें धीरे-धीरे मजबूत बना देगा, और फिर तुम उतने कमजोर नहीं रहोगे जितने तुम शुरुआत में थे। तुम चाहे जितने भी कमजोर और निष्क्रिय हो, तुम चाहे जितने भी व्यथित और नकारात्मक महसूस कर रहे हो, इसे परमेश्वर को बताओ। परमेश्वर को अजनबी मत समझो; तुम इसे किसी से भी छिपा सकते हो, लेकिन परमेश्वर से मत छिपाओ, क्योंकि अकेला परमेश्वर ही है जिस पर तुम निर्भर कर सकते हो, अकेला वही है जो तुम्हें बचा सकता है। केवल लोगों के परमेश्वर के सामने आने से ही इन चीजों का समाधान होगा। दूसरों पर निर्भर रहना बेकार है। और इसलिए, जब लोगों का सामना ऐसी चीज से हो, जो उन्हें कमजोर और निष्क्रिय बना सकती है, तो सबसे बुद्धिमान वे हैं जो परमेश्वर के सामने आ पाते हैं और उस पर भरोसा कर पाते हैं। केवल मूर्ख ही स्वयं को परमेश्वर से दूर-से-दूर रखते हैं और जब बड़ी, दु:साध्य घटनाएँ घटित होती हैं और परमेश्वर को अपने विश्वास में लेने की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, तो वे अपने-आपको उससे सबसे ज्यादा छिपाए रहते हैं, और इन बातों को लेकर दिल-ही-दिल में चिंतामग्न रहते हैं। और तब क्या होता है जब वे उन्हें लेकर चिंतामग्न रहते हैं? ये शिकायतें विरोध बन जाती हैं, और विरोध परमेश्वर के विरुद्ध प्रतिरोध और कोलाहल बन जाता है। ये लोग परमेश्वर के साथ असंगत हो जाते हैं, और परमेश्वर के साथ उनका संबंध पूरी तरह से टूट जाता है। लेकिन जब इस तरह की कमजोरी और निष्क्रियता का सामना करने पर तुम तब भी परमेश्वर के सामने आने का विकल्प चुनते हो, खुद पर परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारते हो, उसके आयोजन और व्यवस्थाएँ स्वीकारते हो, तो तुम्हारा रवैया आज्ञाकारिता का रहता है, और जब परमेश्वर तुम्हारी ईमानदारी देखता है और जब वह तुम्हारी कमजोरी देखता है, तो वह जानता है कि तुम्हारा कैसे मार्गदर्शन करना है, कैसे तुम्हें कमजोरी और निष्क्रियता से बाहर निकालना है। और इसलिए, परमेश्वर के मार्गदर्शन में ये चीजें नगण्य जैसी होकर बहुत आसान हो जाती हैं; बिना तुम्हारे जाने ही परमेश्वर उन्हें दूर करने में तुम्हारी मदद करता है, तुम अनजाने में ही एक रास्ता खोज लेते हो, और अनजाने में ही मजबूत हो जाते हो, और पहले की तरह कमजोर नहीं रहते। जब तुम पलटकर पीछे देखते हो, तो तुम्हें आश्चर्य होता है कि उस समय तुम्हारी कमजोरी इतनी बचकानी कैसे हो सकती थी। लेकिन लोग ऐसे ही बचकाने होते हैं। परमेश्वर की मदद के बिना वे कभी भी बचकानेपन और मूर्खता की स्थिति से निकलकर परिपक्वता की स्थिति में नहीं आ पाएँगे। केवल तभी जब इन बचकानी बातों का अनुभव करने के क्रम में, लोग धीरे-धीरे परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं, और सिद्धांत और परमेश्वर की इच्छा की खोज करते हुए सक्रिय रूप से इन मामलों का सीधे सामना करते हैं—बजाय इसके कि जितना अधिक वे ऐसी चीजों का सामना करें, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से दूर भटक जाएँ, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से छिप जाएँ, और उतना ही अधिक वे परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करें, और न तो परमेश्वर से कुछ कहें और न ही उसके वचन पढ़ें, जब उनकी इनमें से कोई भी स्थिति नहीं होती—केवल तभी लोग अधिकाधिक परिपक्व और अधिकाधिक प्रौढ़ होते हैं।

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