सच्ची पश्चाताप के सिद्धांत कैसे करें: परमेश्वर के प्रासंगिक वचन
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| सच्ची पश्चाताप के सिद्धांत कैसे करें: परमेश्वर के प्रासंगिक वचन |
हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का विरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना इंसान की प्रकृति है, लेकिन इंसान को महज़ इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्य" को पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि अपनी प्रकृति बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसी बात है, तो बेहतर होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और तुम्हारी क्रूर प्रकृति उभर आए और उच्छृंखल हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भौतिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए। तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो; लेकिन अगर अंत में, तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो क्या यह शर्मिंदगी की बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि बेहतर होगा कि तुम कोई अन्य योजना बनाओ। तुम जो भी करो, वो परमेश्वर में आस्था रखने से बेहतर होगा : यकीनन ऐसा तो नहीं हो सकता कि यही एक मार्ग है। अगर तुमने सत्य की खोज नहीं की तो क्या तुम जीवित नहीं रहोगे? तुम क्यों इस प्रकार से परमेश्वर के साथ असहमत हो?
— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत
हर व्यक्ति ने अपने जीवन में परमेश्वर में आस्था के दौरान किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर का प्रतिरोध किया है, उसे धोखा दिया है। कुछ गलत कामों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होते हैं; क्योंकि बहुत से कर्म ऐसे होते हैं जिनसे प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन होता है, जो परमेश्वर के स्वभाव के प्रति अपराध होते हैं। भाग्य को लेकर चिंतित बहुत से लोग पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौनसे हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से ही अहंकारी और अकड़बाज हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक नहीं हो। इसलिए जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म तो ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब पाप करने की कोई और छूट नहीं बची है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर तुममें पश्चाताप के कोई लक्षण भी नहीं दिखते, इसलिए तुम्हारे पास नरक में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है।
— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृ
एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से गलतियाँ करना चाहते हो, तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?
यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह चीज़ जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है इसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।
दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।
तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)
यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।
— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत
तथ्य यह है कि हर व्यक्ति ने, कमोबेश, पाप किया है। जब तुम किसी चीज़ के बारे में यह नहीं जानते कि वह पाप है, तो तुम उसके बारे में धुँधले-से ढंग से सोचते हो या शायद तुम अपनी धारणाओं, आदतों और समझने के तौर-तरीक़ों से चिपके रहते हो—लेकिन एक दिन, चाहे अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति के माध्यम से या परमेश्वर के प्रकाशन के माध्यम से, तुम जान जाते हो कि यह एक पाप है, परमेश्वर का अपमान है। तब तुम्हारा रवैया क्या होगा? क्या तुम तब भी, इस विश्वास के साथ कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है, अपनी ज़िद पर अड़े रहते हुए तर्क देते रहोगे, बहस करते रहोगे, अपने विचारों का अनुसरण करते रहोगे, यह मानते हुए कि जो तुम कर रहे हो वह सत्य के साथ तालमेल में है? यह चीज़ परमेश्वर के साथ तुम्हारे रवैये से संबंध रखती है। डेविड ने अपने पाप के प्रति किस तरह का रवैया अपनाया था? पश्चाताप–मैं अब यह पाप नहीं करूँगा। तब उसने क्या किया था? उसने परमेश्वर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दंड दे : "अगर मैं यह ग़लती फिर से करूँ, तो परमेश्वर मुझे दंड दे और मेरी मृत्यु का कारण बने!" यह था उसका संकल्प; वह सच्चा पश्चाताप था। क्या साधारण लोग इसे हासिल कर सकते हैं? साधारण लोगों के लिए यही अच्छा है कि वे बहस करने की कोशिश नहीं करते या चुपचाप जवाबदेही स्वीकार कर लेते हैं और मन-ही-मन यह सोचते हैं : "उम्मीद है अब फिर से यह मुद्दा कोई नहीं उठाएगा। मुझे अपमानित होना पड़ेगा।" क्या यह सच्चा पश्चाताप है? सच्चे पश्चाताप के लिए अनिवार्य है कि तुम अतीत की अपनी बुराई को त्याग दो, उसे ख़त्म कर दो और भविष्य में उसे न दोहराओ। तब फिर क्या किया जाए? क्या मात्र बुराई को त्याग देने से और वह कृत्य न करने तथा उसके बारे में न सोचने से काम चल जाएगा? परमेश्वर के प्रति तुम्हारा क्या रवैया है? अब तुम स्वयं को परमेश्वर के समक्ष उजागर करते हुए उसके प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाओगे? (हम परमेश्वर का दंड स्वीकार करेंगे।) परमेश्वर के दंड को, उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना–यह उसका एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा है परेमश्वर के दंड को स्वीकार करते हुए उसकी पड़ताल को स्वीकार करना। जब तुम इन दोनों हिस्सों को स्वीकार कर लोगे, तब तुम्हारे संकल्प का रूप क्या होगा? जब भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों और मसलों से तुम्हारा सामना होगा, तब तुम क्या करोगे? सच्चे पश्चाताप के बिना व्यक्ति अपनी बुराई को नहीं त्याग सकता और वे कहीं भी, कभी भी, अपने पुराने तौर-तरीक़ों पर वापस लौट सकते हैं और बार-बार उसी बुरे काम को, उसी पाप को, उसी भूल को दोहरा सकते हैं। इससे सत्य और परमेश्वर के प्रति मनुष्य का रवैया ज़ाहिर होता है। तब फिर पाप से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए क्या कर सकते हैं? सत्य का अभ्यास? सत्य के प्रति लोगों का रवैया सही होना चाहिए। और सत्य के प्रति लोगों को क्या रवैया अपनाना चाहिए तथा सत्य के प्रति उनका रवैया सही है यह दर्शाने के लिए उन्हें किस तरह का अभ्यास करना चाहिए? अगर इस तरह के मसले से तुम्हारा दोबारा सामना होने पर तुम प्रलोभन के शिकार हो जाते हो, तब तुम क्या करेंगे? दो शब्द : "दूर रहो!" इसी के साथ-साथ अगर लोग फिर-से वैसी ही ग़लती करते हैं, तो लोगों को परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाने के संकल्प पर भी अडिग रहना चाहिए। ऐसा करना उस बुराई से सच्चे हृदय से घृणा करना है, उसे दुनिया की सबसे ज़्यादा घृणित, पापपूर्ण, परमेश्वर को अपमानित करने वाली चीज़ के रूप में देखना है, उसे शाश्वत कलंक के रूप में देखना है। बाइबल कहती है : "चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं" (नीतिवचन 22:3)। यह सरलता नहीं है—यह स्पष्ट और सीधे तौर पर बेवकूफ़ी है। "दूर रहो"—यह अभ्यास करने का ढंग कैसे है? (यह अच्छा है।) क्या ऐसा वक़्त नहीं आता जब लोग दूर नहीं रह पाते? तब तुम क्या करोगे? तुम्हें सच्चे मन से परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी और उससे स्थितियों के आयोजन का अनुरोध करना होगा। कुछ परीक्षाएं भी प्रलोभनकारी होती हैं। आख़िर परमेश्वर ऐसी स्थितियों को तुम्हारे साथ घटित होने की गुंजाइश ही क्यों देता है? ये संयोग से घटित नहीं होतीं; इनके माध्यम से परमेश्वर तुम्हें आज़मा रहा है, तुम्हारी परीक्षा ले रहा है। जब तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए निश्चित की गई परिस्थितियों से और उन परीक्षणों से अपना मुँह फेर लेते हो, जिन्हें वह तुम्हारे सामने पेश करता है और उद्दंड रवैया अपना लेते हो और न प्रार्थना करते हो न याचना करते हो, न ही उन परिस्थितियों और परीक्षणों के दौरान अभ्यास के मार्ग की खोज करते हो, तब क्या यह चीज़ परमेश्वर के प्रति मनुष्य के रवैये के बारे में नहीं बताती? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं : "मेरे ऐसे विचार नहीं रहे हैं, और मेरा वह उद्देश्य नहीं था।" अगर तुम उद्देश्य-रहित हो, तब परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया क्या है? कुछ रवैये सुविचारित और सोद्देश्य होते हैं, जबकि कुछ के पीछे कोई उद्देश्य नहीं होता–तुम्हारा रवैया कैसा है? क्या ऐसा व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है, जो उद्दंड होता है और परमेश्वर को गंभीरता से नहीं लेता? यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जो व्यक्ति सत्य और परमेश्वर को बच्चों का खेल समझता है, उन्हें मूल्यहीन समझता है, वह सत्य को प्रेम करने वाला व्यक्ति नहीं होता।
