पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कैसे करें: Almighty God

पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कैसे करें 

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पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कैसे करें 

 परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज़ आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि जो तुम संवाद और अनुसरण करते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँभी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों की परमेश्वर द्वारा सराहना नहीं की जाती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत


राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का अर्थ है, परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत—क्या तुम इस तरह का प्रशिक्षण स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन में जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आएँगेऔर तुम्हारी परीक्षा लेंगे, तब तुम क्या करोगे? और जब सभी तरह के तथ्यों से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम क्या करोगे? अतीत में तुम्हारा ध्यान जीवन पर केंद्रित नहीं था; आज तुम्हें जीवन-वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। यही है जो राज्य के लोगों द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। वो सभी जो परमेश्वर के लोग हैं, उनके पास जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनीचाहिए। परमेश्वर राज्य के लोगों से यही अपेक्षा रखता है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ अपेक्षाएं इस प्रकार हैं:


ये पाँचबातें तुम सबके लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के इच्छुकनहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहींकरूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा पर चलने में सक्षम होंगे होगे। आज तुम सभी परमेश्वर के आदेश स्वीकार करना शुरू करो और राज्य के लोग बनने की कोशिश करो और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानक हासिल करने का प्रयास करो। यह प्रवेश का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँचआदेशों को स्वीकार करना होगा और यदि तुम ऐसाकर पाने में सक्षम रहे, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक होंगे और परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा महान उपयोग करेगा। आज जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह हैराज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश में आध्यात्मिक जीवन शामिल है। इससे पहले आध्यात्मिक जीवन की कोई बात नहीं होती थी लेकिन आज, जैसे ही तुम राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू करते हो, तुम आधिकारिक तौर पर आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत


कलीसिया के जीवन में अभी तक सुधार नहीं हुआ है, और उसमें अभी भी वही पुरानी बात है? उसमें जीवन का एक बिलकुल नया और अलग तरीका क्यों नहीं है? क्या नब्बे के दशक के किसी व्यक्ति का एक बीते युग के सम्राट की तरह जीना सामान्य होगा? यद्यपि अब लोग जो खाते और पीते हैं, वे ऐसे पकवान हैं, जो पिछले युगों में शायद ही कभी चखे गए हों, किंतु कलीसिया के जीवन में कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ है। यह पुरानी शराब को नई बोतलों में डालने जैसा रहा है। तो फिर परमेश्वर के इतना कहने का क्या लाभ है? अधिकांश जगहों पर कलीसिया बिलकुल भी नहीं बदले हैं। मैंने इसे अपनी आँखों से देखा है और यह मेरे हृदय में स्पष्ट है; यद्यपि मैंने स्वयं के लिए कलीसिया के जीवन का अनुभव नहीं किया है, फिर भी मैं कलीसिया की सभाओं की स्थितियों को बहुत अच्छे से जानता हूँ। उन्होंने बहुत प्रगति नहीं की है। यह उस पुरानी कहावत की याद दिलाती है—यह पुरानी शराब नई बोतलों में डालने की तरह है। कुछ भी नहीं बदला! जब कोई उनकी चरवाही करता है, तो वे आग की तरह जलते हैं, लेकिन जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए नहीं होता, तो वे बर्फ के एक खंड की तरह होते हैं। ज्यादा लोग व्यावहारिक चीज़ों की बात नहीं कर सकते, और शायद ही कोई पतवार थाम सकता है। यद्यपि उपदेश बुलंद हैं, किंतु शायद ही कभी किसी को प्रवेश मिला है। 

कुछ ही लोग परमेश्वर के वचन को मानते हैं। जब वे परमेश्वर के वचन को ग्रहण करते हैं, तो वे दुखी हो जाते हैं, और जब उसे एक तरफ रख देते हैं, तो खुश हो जाते हैं; और जब उससे अलग होते हैं, तो निष्प्राण और निस्तेज हो जाते हैं। स्पष्ट रूप से बोलूँ तो, तुम लोग परमेश्वर के वचन को सँजोते नहीं, और उसके अपने मुँह से निकले हुए वचन को आज खज़ाने के रूप में नहीं देखते। तुम बस परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय उत्सुक होते हो और उसे स्मरण करते हुए उत्साही अनुभव करते हो, पर जब उसके वचन पर अमल करने की बात आती है, तो वह कुएँ से रस्सी के बजाय घोड़े की पूँछ के बाल से पानी खींचने की कोशिश करने जैसा होता है—तुम कितना भी कठिन प्रयास क्यों न कर लो, तुम पर्याप्त ऊर्जा लगा ही नहीं पाओगे। परमेश्वर के वचन को पढ़ते समय तुम हमेशा ऊर्जा से भरे होते हो, लेकिन उसका अभ्यास करते समय लापरवाह हो जाते हो। वास्तव में, ये वचन इतनी शिद्दत से बोले जाने और इतने धैर्य से दोहराए जाने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन यह तथ्य कि लोग परमेश्वर के वचनों को सिर्फ सुनते हैं, उन्हें अभ्यास में नहीं लाते, परमेश्वर के कार्य में बाधा बन गया है। मैं इसका जिक्र नहीं कर सकता, मैं इसके बारे में बात नहीं कर सकता। मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ; ऐसा नहीं है कि मुझे दूसरों की कमज़ोरियाँ उजागर करने में मज़ा आता है। तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारा अभ्यास कमोबेश पर्याप्त है—कि जब प्रकाशन शिखर पर होते हैं, तो तुम्हारा प्रवेश भी शिखर पर होता है? क्या यह इतना आसान है? 

तुम लोग कभी उस नींव की जाँच नहीं करते, जिस पर अंततः तुम्हारे अनुभव निर्मित होते हैं! फ़िलहाल तुम लोगों की सभाओं को बिलकुल भी उचित कलीसिया-जीवन नहीं कहा जा सकता, न ही वे बिलकुल भी सही आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करते हैं। यह बस लोगों के एक समूह का जमावड़ा है, जिन्हें गपशप करने और गाने में मज़ा आता है। सच कहूँ तो, इसमें ज्यादा वास्तविकता नहीं है। थोड़ा और स्पष्ट करूँ तो, यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो वास्तविकता कहाँ है? क्या यह कहना शेखी बघारना नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है? जो लोग हमेशा कार्य करते हैं, वे अभिमानी और दंभी होते हैं, जबकि जो लोग हमेशा आज्ञापालन करते हैं, वे प्रशिक्षण का कोई अवसर पाए बिना शांत रहते हैं और अपना सिर नीचे रखते हैं। जो लोग कार्य करते हैं, वे सिवाय बातों के कुछ नहीं करते, अपने आडंबरपूर्ण भाषण जारी रखते हैं, और अनुयायी केवल सुनते हैं। कोई रूपांतरण नहीं है, जिसके बारे में बोला जा सके; ये सब बस अतीत के तरीके हैं! आज, तुम्हारा झुकने में समर्थ बिना जाना और हस्तक्षेप करने या मनमाना व्यवहार करने की हिम्मत न करना परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के आगमन के कारण है; यह परिवर्तन तुम्हारे अनुभवों से गुज़रने के माध्यम से नहीं आया है। यह तथ्य कि तुम कुछ चीज़ों को करने का साहस अब और नहीं करोगे जो आज प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करती हैं, इस कारण से है, क्योंकि परमेश्वर के वचनों के


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