सत्य को अनुसरण कैसे करें: नकारात्मक भावना बाहर कैसे निकले
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| सत्य को अनुसरण कैसे करें |
मनुष्य की सारी नकारात्मक भावनाएँ विविध गलत विचारों, गलत सोच, गलत जीवनशैली, और जीवन के गलत शैतानी फलसफों के कारण पैदा होती हैं। तुम्हारे असल जीवन में भी कुछ चीजें होती हैं, खास तौर से तब जब तुम इन चीजों के सार को स्पष्ट रूप से समझ पाने में असमर्थ होते हो, तो तुम बड़ी आसानी से इन चीजों का रंग-रूप देख भयभीत हो कर इनसे घिर सकते हो, और बड़ी आसानी से उलझन में पड़ सकते हो, जिससे तुम वापस अपनी पुरानी जीवनशैली अपना सकते हो; तुम अनजाने ही अपनी रक्षा करने लगोगे, परमेश्वर और सत्य का परित्याग कर, बच निकलने की राह खोजने, जीने का तरीका और जीते रहने की आशा खोजने के लिए अपने ही उन तरीकों और विधियों का प्रयोग करोगे जिन्हें तुम सर्वाधिक पारंपरिक और भरोसेमंद मानते हो। हालाँकि ऊपर से ये नकारात्मक भावनाएँ सिर्फ भावनाओं के रूप में मौजूद होती हैं, और अगर हम इन भावनाओं का शब्दों में बयान करें, तो वे शाब्दिक अर्थ में सादी लगती हैं और उतनी गंभीर नहीं लगतीं, कुछ लोग इन नकारात्मक भावनाओं से कस कर चिपक जाते हैं, और उन्हें जाने नहीं देते, मानो उस तिनके से चिपके हुए हों, जो उन्हें डूबने से बचाएगा, और वे इन चीजों से कस कर बंध और जकड़ जाते हैं। दरअसल, उनके इन नकारात्मक भावनाओं से बंधे होने का कारण वे विविध तरीके हैं जिन पर मनुष्य अपने जीवित रहने के लिए भरोसा करता है, और साथ ही वे विविध विचार और सोच हैं जो उस पर हावी होती हैं, और उनके वे तमाम रवैये हैं जो वे निजी जीवन और जीवित रहने के प्रति अपनाते हैं। इसलिए, भले ही अवसाद, संताप, व्याकुलता, चिंता, हीनता, घृणा, क्रोध वगैरह की तमाम भावनाएँ नकारात्मक होती हैं, फिर भी लोगों को लगता है कि इन पर भरोसा किया जा सकता है, इन भावनाओं में डूबने के बाद ही वे सुरक्षित महसूस करते हैं, और उन्हें लगता है कि उन्होंने खुद को पा लिया है और वे अस्तित्व में हैं। वास्तविकता यह है कि लोगों का इन भावनाओं में घिर जाना, सत्य से विपरीत दिशा में जाता है, और सत्य से, साथ ही सोचने के सही तरीकों, सही विचारों और सोच से, और चीजों के प्रति उस सही रवैये और सोच से बहुत दूर चला जाता है जिसे परमेश्वर उन्हें अपनाने के लिए कहता है। तुम चाहे जिस भी नकारात्मक भावना का अनुभव करो, तुम उसमें जितनी गहराई तक डूबोगे, उससे उतने ही बंध जाओगे; तुम उससे जितना ज्यादा बंधोगे, उतना ही खुद की रक्षा करने की जरूरत महसूस करोगे; तुम रक्षा की जितनी ज्यादा जरूरत महसूस करोगे, उतना ही ज्यादा तुम सशक्त, सक्षम और काबिल बनने की आशा करोगे ताकि जीने के अवसर जीत सको, दुनिया पर विजय पाने हेतु विविध जीवनशैलियाँ ढूँढ़ सको, दुनिया में तुम्हारे सामने आने वाली तमाम मुश्किलों पर विजय पा सको और जीवन की तमाम मुश्किलों और कठिनाइयों से उबर सको। तुम इन भावनाओं में जितना ज्यादा डूबोगे, उतना ही ज्यादा तुम अपने जीवन में आने वाली तमाम मुश्किलों को काबू में करना और उन्हें दूर करना चाहोगे। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, ऐसा ही है।) तो फिर मनुष्य के ये विचार कैसे उपजते हैं? आओ, मिसाल के तौर पर शादी को लें। तुम शादी को लेकर संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करते हो, मगर इन सबके पीछे आखिर वास्तविक मसला क्या है? तुम किस बारे में चिंतित हो? यह चिंता कहाँ से आती है? इसका स्रोत तुम्हारा यह न जानना है कि यह शादी भाग्य द्वारा व्यवस्थित और शासित है और स्वर्ग द्वारा व्यवस्थित और शासित है। यह न जानने के कारण तुम हमेशा खुद फैसले लेकर, योजना, प्रस्ताव और रूपरेखा बनाना चाहते हो, बार-बार ऐसी चीजें सोचते हो, “मुझे कैसा जीवनसाथी तलाशना चाहिए? उसकी लंबाई कितनी होनी चाहिए? उसका रंग-रूप कैसा होना चाहिए? उसका व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए? उसे कितना शिक्षित होना चाहिए? उसका खानदान कैसा होना चाहिए?” तुम्हारी योजना जितनी ज्यादा विस्तृत होती है, तुम उतनी ही फिक्र करते हो, क्या ऐसा नहीं है? तुम्हारी अपेक्षाएँ जितनी ऊँची और जितनी ज्यादा होती हैं, तुम उतनी ही चिंता करते हो, है ना? और जीवनसाथी ढूँढ़ना उतना ही मुश्किल हो जाता है, है ना? (हाँ।) जब तुम नहीं जानते कि कोई तुम्हारे लिए उपयुक्त है या नहीं, तो तुम्हारी मुश्किलें उतनी ही बड़ी हो जाती हैं, और तुम्हारी मुश्किलें जितनी बड़ी हो जाती हैं, संताप और व्याकुलता की भावनाएँ उतनी ही गंभीर हो जाती हैं, सही है या नहीं? संताप और व्याकुलता की तुम्हारी भावनाएँ जितनी गंभीर होती हैं, उतनी ही ज्यादा ये भावनाएँ तुम्हें जाल में फँसा लेती हैं। तो तुम्हें इस समस्या को कैसे सुलझाना चाहिए? मान लो कि तुम्हें शादी के सार की समझ है, और तुम आगे का सही रास्ते और दिशा जानते-समझते हो—तो फिर शादी को लेकर सही दृष्टिकोण क्या है? तुम कहते हो, “शादी जीवन की एक बड़ी घटना है, और लोग चाहे जो चुनें, यह सब बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित हो चुका है। परमेश्वर ने बहुत पहले ही निर्धारित और व्यवस्थित कर दिया था कि तुम्हारा जीवनसाथी कौन और कैसा होगा। लोगों को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, या अपनी कल्पनाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए, अपनी पसंद पर तो बिल्कुल भी नहीं। अपनी कल्पनाओं और पसंद पर भरोसा करना और जल्दबाजी करना, ये सभी अज्ञानता की अभिव्यक्तियाँ हैं, ये वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं। लोगों को अपनी चाहत को खुले नहीं उड़ने देना चाहिए, और सारी कल्पनाएँ असलियत के विपरीत होती हैं। सबसे व्यावहारिक चीज जो करनी चाहिए वह है चीजों को सहज रूप से आगे बढ़ने देना और उस व्यक्ति की प्रतीक्षा करना जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने तुम्हारे लिए की है।” तो इस सिद्धांत और इस व्यावहारिक समझ को अपनी बुनियाद बनाकर इस विषय पर तुम्हें कैसे अमल करना चाहिए? तुम्हें आस्था रखनी चाहिए, परमेश्वर के समय और उसकी व्यवस्था की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अगर परमेश्वर इस जीवन में तुम्हारे लिए एक उपयुक्त जीवनसाथी की व्यवस्था करता है, तो वह सही समय, सही जगह और सही माहौल में प्रकट हो जाएगा। यह हालात के पूरी तरह तैयार होने पर हो जाएगा, तुम्हें बस इतना करना होगा कि ऐसे समय, स्थान और माहौल में सहयोग देनेवाला व्यक्ति बनना होगा। तुम बस प्रतीक्षा ही कर सकते हो—इस समय, इस स्थान और इस माहौल की प्रतीक्षा करो, इस व्यक्ति के प्रकट होने और इन सब चीजों के होने की प्रतीक्षा करो, न सक्रिय होकर न ही निष्क्रिय होकर, बल्कि बस इन चीजों के होने और आने की प्रतीक्षा करो। “प्रतीक्षा” से मेरा क्या अर्थ है? मेरा तात्पर्य है एक समर्पण का रवैया रखना, न सक्रिय होना न निष्क्रिय; ऐसा रवैया अपनाना जो हठी न हो बल्कि खोजी और समर्पण का हो। एक बार जब तुम ऐसा रवैया अपना लेते हो, तो भी क्या तुम शादी को लेकर संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करोगे? (नहीं।) तब तुम्हारी अपनी योजनाएँ, कल्पनाएँ, कामनाएँ, झुकाव और तमाम अज्ञानी सोच जोकि तथ्यों के विपरीत हैं, गायब हो जाते हैं। तब तुम्हारा हृदय शांत होता है, और तुम शादी को लेकर कोई नकारात्मक भावनाएँ अनुभव नहीं करते। तुम इस मामले में निश्चिंत, मुक्त और आजाद महसूस करते हो, और चीजों को स्वाभाविक ढंग से आगे बढ़ने देते हो। एक बार सही रवैया अपना लेने के बाद, तुम जो भी करते हो और जो कुछ व्यक्त करते हो, वह तर्कसंगत और उपयुक्त हो जाता है। तुम्हारी सामान्य मानवता के भीतर से अभिव्यक्त भावनाएँ सहज रूप से संताप, व्याकुलता और चिंता नहीं हो सकतीं, बल्कि ये शांत और स्थिर होती हैं। भावनाएँ अवसादग्रस्त करने वाली या उग्र नहीं होतीं—तुम बस प्रतीक्षा करो। तुम्हारे मन में अभ्यास और रवैये का एकमात्र तरीका है प्रतीक्षा और समर्पण करना : “मैं परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हर चीज के प्रति समर्पण करना चाहता हूँ। मेरी कोई भी निजी अपेक्षा या योजना नहीं है।” ऐसा करके क्या तुमने इन नकारात्मक भावनाओं को जाने नहीं दिया है? और क्या ऐसा नहीं है कि ये भावनाएँ पैदा नहीं होंगी? तुमने भले ही इन्हें महसूस किया हो, लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि तुम उन्हें धीरे-धीरे जाने दोगे? तो इन नकारात्मक भावनाओं को त्याग देने की प्रक्रिया किस किस्म की प्रक्रिया है? क्या यह सत्य का अनुसरण करने की अभिव्यक्ति है? यह दिखाती है कि तुम सत्य का अनुसरण और अभ्यास दोनों कर रहे हो। सत्य का अनुसरण करने से हासिल अंतिम परिणाम सत्य का अभ्यास करना होता है—सत्य का अभ्यास करने के जरिये इसे लागू किया जाता है। जब तुम सत्य का अभ्यास करने का स्तर हासिल कर लोगे, तो संताप, व्याकुलता और चिंता अब साये की तरह तुम्हारा पीछा नहीं करेंगी; ये तुम्हारे अंतरतम में से पूरी तरह निकाली जा चुकी होंगी। क्या इन भावनाओं को निकालने की प्रक्रिया त्याग देने की प्रक्रिया है? (हाँ।) सत्य पर अमल करना इतना सरल है। क्या यह आसान है? सत्य पर अमल करना विचारों और सोच में परिवर्तन है, और इससे भी ज्यादा यह चीजों को लेकर व्यक्ति के रवैये में परिवर्तन है। एक सरल नकारात्मक भावना को त्याग देने के लिए, व्यक्ति को इन प्रक्रियाओं का अभ्यास कर उन्हें हासिल करना चाहिए। पहले तो व्यक्ति के विचारों और सोच में परिवर्तन होना चाहिए, फिर अभ्यास के तरीके, अभ्यास के सिद्धांतों और अभ्यास के मार्ग में परिवर्तन से पहले अभ्यास के प्रति रवैये में परिवर्तन होना चाहिए। तब क्या तुमने उस नकारात्मक भावना को जाने नहीं दिया होगा? यह इतना ही सरल है। “त्याग देने” के जरिये जो अंतिम परिणाम तुम हासिल करते हो, वह यह है कि तुम अब इस नकारात्मक भावना से परेशान, विकल, और नियंत्रित नहीं होते, और साथ ही तुम अब इस नकारात्मक भावना से उपजने वाले हर तरह के नकारात्मक विचारों और सोच से त्रस्त नहीं होते। इस प्रकार, तुम निश्चिंत, आजाद और मुक्त महसूस करते हुए जियोगे। बेशक निश्चिंत, आजाद और मुक्त महसूस करना महज मानवीय भावनाएँ हैं—लोगों को असली फायदा यह होता है कि वे सत्य समझ लेते हैं। मनुष्य के अस्तित्व का आधार सत्य और परमेश्वर के वचन हैं। अगर लोग आत्म-रक्षा के लिए विविध नकारात्मक भावनाओं में जीने के लिए अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करते हैं, अगर वे अपनी सुरक्षा के लिए खुद पर और अपनी काबिलियत, साधनों और विधियों पर भरोसा करते हैं, और अपने ही रास्ते चलते हैं, तो फिर वे सत्य और परमेश्वर से भटक गए होंगे, और स्वाभाविक रूप से शैतान की सत्ता में रहने लग गए होंगे। इसलिए जब तुम ऐसी ही मुश्किलों और स्थितियों का सामना करते हो, तब तुम्हें अपने दिल में यह समझ रखनी चाहिए और फिर तुम सहज ढंग से सोचोगे, “मुझे इन चीजों की चिंता करने की जरूरत नहीं। चिंता करने का कोई तुक नहीं। विवेकशील और बुद्धिमान लोग परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, ऐसी तमाम चीजें परमेश्वर को सौंप देते हैं, उसकी संप्रभुता को समर्पित हो जाते हैं, परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित सभी चीजों की प्रतीक्षा करते हैं, और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित समय, स्थान, व्यक्ति या चीज की प्रतीक्षा करते हैं। मनुष्य सिर्फ सहयोग कर समर्पण कर सकता है और उसे यही करना चाहिए—यही चुनाव सबसे समझदारी भरा है।” बेशक अगर तुम यह नहीं करते और इस तरह अभ्यास नहीं करते, तो भी परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित तमाम चीजें अंत में जरूर होंगी—मनुष्य अपनी इच्छा से किसी भी व्यक्ति, घटना, स्थिति को नहीं बदल सकता। मनुष्य का संताप, व्याकुलता और चिंता बस एक निरर्थक न्योछावर है, और ये बस मनुष्य के मूर्खतापूर्ण विचार और उसकी अज्ञानतापूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं। संताप, व्याकुलता और चिंता की तुम्हारी भावनाएँ चाहे जितनी गंभीर क्यों न हों, या तुम किसी मामले पर जितने भी विस्तृत ढंग से क्यों न सोचो, अंत में ये सब बेकार है और इसे त्याग देना चाहिए। मनुष्य अपनी इच्छा से अंतिम तथ्यों और परिणामों को नहीं बदल सकता। अंत में मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन ही जीना होगा; ये चीजें कोई नहीं बदल सकता, और कोई भी इन चीजों से छूट नहीं सकता। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, ऐसा ही है।)
आओ, अब रोग के बारे में चर्चा करें। मनुष्य की इस बूढ़ी देह की बात आने पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों को कौन-सा रोग हुआ है, वह ठीक हो सकता है या नहीं, या उसे किस हद तक सहना होगा, ये सब उसके हाथ में नहीं है—परमेश्वर के हाथ में है। बीमार पड़ने पर अगर तुम परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करते हो, और इस सच्चाई को स्वीकार करने और सहने को तैयार हो जाते हो, तब भी तुम्हें यह रोग रहेगा; अगर तुम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते, तो भी तुम इस रोग से छुटकारा नहीं पा सकते—यह एक तथ्य है। तुम अपना रोग एक दिन तक सकारात्मक होकर झेल सकते हो, या एक दिन तक नकारात्मक होकर। यानी तुम्हारा रवैया चाहे जो हो, तुम इस तथ्य को नहीं बदल सकते कि तुम बीमार हो। विवेकशील लोग कौन-सा विकल्प चुनते हैं और मूर्ख लोग कौन-सा चुनते हैं? मूर्ख लोग संताप, व्याकुलता और चिंता की भावनाओं में जीने को चुनते हैं। वे इन भावनाओं में पूरी तरह घिरकर बाहर भी नहीं निकलना चाहते। वे कोई भी परामर्श नहीं मानते और सोचते हैं, “अरे, मुझे यह बीमारी कैसे हो गई? क्या यह थकान से हुई? चिंता के कारण हुई? या निषेध के कारण?” हर दिन, वे सोचते हैं कि वे बीमार कैसे पड़े और यह कब शुरू हुई, “मैंने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? मैं इतना बेवकूफ होकर अपना कर्तव्य इतनी ईमानदारी से कैसे निभाता रहा? दूसरे लोग हर साल शारीरिक जाँच करवाते हैं, और कम-से-कम अपने रक्तचाप की माप करवाते हैं, एक्स-रे लेते हैं। मुझे यह एहसास क्यों नहीं हुआ कि मुझे शारीरिक जाँच करवानी चाहिए? दूसरे लोग इतनी सावधानी से रहते हैं, मैं इतना कुंद बनकर क्यों जीता रहा? मुझे यह बीमारी हो गयी और मुझे पता भी नहीं चला। मुझे इस बीमारी का इलाज करवाना चाहिए! मुझे कौन-सा इलाज मिल सकता है?” फिर वे ऑनलाइन जाकर खोजते हैं कि उन्हें यह बीमारी कैसे हुई, किस कारण हुई, चीनी दवाओं से इसका इलाज कैसे करें, पश्चिमी दवाओं से कैसे करें, और कौन-से देसी नुस्खे हैं—वे ये तमाम चीजें खोजते हैं। इसके बाद, वे चीनी दवाएँ और फिर पश्चिमी दवाएँ घर ले जाते हैं, बीमार होने को लेकर हमेशा गमगीन, व्याकुल और बेसब्र रहते हैं, और समय के साथ, वे अपना कर्तव्य निर्वहन छोड़ देते हैं, वे परमेश्वर में अपनी आस्था दूर फेंक देते हैं, विश्वास रखना छोड़ देते हैं, और सिर्फ अपनी बीमारी को ठीक करने के बारे में सोचते रहते हैं; उनका कर्तव्य अब अपनी बीमारी ठीक करना है। वे अपनी बीमारी में समा जाते हैं, वे बीमार होने को लेकर हर दिन संतप्त महसूस करते हैं, और कोई भी दिख जाए तो कहते हैं, “अरे, मुझे यह बीमारी ऐसे हुई। मुझे जो हुआ उसे तुम अपने लिए सबक समझो, जब बीमार हो जाओ, तो तुम्हें जाँच करवाकर इलाज करवाना चाहिए। अपनी सेहत की देखभाल करना सबसे अहम है। तुम्हें अक्लमंद होना चाहिए, ज्यादा बेवकूफी से नहीं जीना चाहिए।” वे जिससे भी मिलते हैं यही बातें कहते हैं। बीमार होकर उन्होंने यह अनुभव किया है और यह सबक सीखा है। बीमार पड़ने के बाद, वे खाने-पीने में बड़े सावधान और चलने-फिरने में बड़े सतर्क हो जाते हैं, और वे अपनी सेहत का ख्याल रखना सीख लेते हैं। अंत में, वे एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं : “लोगों को अपनी सेहत की देखभाल के लिए खुद पर भरोसा करना चाहिए। मैंने पिछले कुछ वर्षों से अपनी सेहत की देखभाल पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, जैसे ही मेरा ध्यान भटका मुझे यह बीमारी हो गई। सौभाग्य से मैंने इसका जल्द पता लगा लिया। अगर देर की होती, तो मैं खत्म हो जाता। बीमार होकर कम उम्र में मर जाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। मैंने अब तक जीवन के मजे नहीं लिए हैं, खाने की ढेरों लजीज चीजें मैंने नहीं खाई हैं, इतनी सारी मजेदार जगहों में अब तक नहीं गया हूँ!” वे बीमार होकर यह निष्कर्ष निकालते हैं। वे बीमार होते हैं मगर मरते नहीं, और उन्हें लगता है कि वे चालाक हैं उन्होंने समय रहते बीमारी का पता लगा लिया है। वे कभी नहीं कहते कि ये सब परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है या उसके द्वारा पूर्व-निर्धारित है, और अगर किसी को मरना नहीं है, तो वह कितनी भी गंभीर बीमारी से ग्रस्त क्यों न हो, वह नहीं मर सकता, और अगर किसी को मरना है, तो वह बिना बीमार हुए भी मर जाएगा—वे यह नहीं समझते। वे मानते हैं कि उनकी बीमारी ने उन्हें चालाक बना दिया है, जबकि दरअसल वे हद से ज्यादा “चालाकी” दिखाते हैं और बड़े मूर्ख हैं। जब सत्य का अनुसरण करने वाले लोग बीमार होते हैं, तो क्या वे संताप, व्याकुलता और चिंता की भावनाओं में घिर जाते हैं? (नहीं।) वे बीमारी के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखेंगे? (पहले, वे समर्पण कर पाते हैं, फिर बीमार पड़ने पर वे परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करते हैं और इस बात पर चिंतन करते हैं कि उनमें कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं।) क्या ये कुछ शब्द समस्या दूर कर सकते हैं? अगर वे बस चिंतन ही करते हैं, तो क्या उन्हें अब अपनी बीमारी का इलाज करवाने की जरूरत नहीं? (वे इलाज भी करवाएँगे।) हाँ, अगर यह ऐसा रोग है जिसका इलाज होना चाहिए, एक बड़ा रोग है, या इलाज न करवाने पर इसके बदतर हो जाने की संभावना है, तो इसका इलाज होना चाहिए—विवेकशील लोग यही करते हैं। मूर्ख लोग बीमार न होने पर भी हमेशा चिंता करते हैं, “ओह, क्या मैं बीमार हूँ? अगर मैं बीमार हूँ, तो क्या यह रोग बदतर हो जाएगा? क्या मुझे वह रोग लग जाएगा? और अगर वह रोग लग गया, तो क्या वक्त से पहले मर जाऊँगा? मरते वक्त क्या मुझे बहुत पीड़ा होगी? क्या मैं खुशहाल जीवन जियूँगा? अगर मुझे वह रोग लग गया, तो क्या मुझे अपनी मृत्यु की तैयारी कर लेनी चाहिए, और जल्द-से-जल्द जीवन के मजे ले लेने चाहिए?” मूर्ख लोग ऐसी चीजों को लेकर अक्सर संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करते हैं। वे कभी सत्य या इस मामले में जो सत्य उन्हें समझने चाहिए उन्हें नहीं खोजते। लेकिन विवेकशील लोगों को इस मामले की थोड़ी समझ और अंतर्दृष्टि तब होती है जब कोई दूसरा बीमार पड़ता है या वे अब तक बीमार न पड़े हों। तो उनमें कैसी समझ और अंतर्दृष्टि होनी चाहिए? सबसे पहले, क्या संतप्त, व्याकुल और चिंतित होने के कारण बीमारी किसी व्यक्ति को छुए बिना ही गुजर जाएगी? (नहीं।) मुझे बताओ, क्या पहले से किसी के भाग्य में यह नहीं लिखा है कि वह कब किस रोग से बीमार पड़ेगा, किस उम्र में उसकी सेहत कैसी रहेगी, और क्या वह कोई बड़ा या गंभीर रोग पकड़ लेगा? मेरी बात मानो, बिल्कुल लिखा हुआ है, और यह पक्का है। हम अभी इस पर चर्चा नहीं करेंगे कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजें कैसे पूर्वनिर्धारित करता है; लोगों का रंग-रूप, नाक-नक्श, डील-डौल और उनकी जन्मतिथि सबको साफ तौर पर पता होती है। गैर-विश्वासी भविष्य बताने वाले, ज्योतिषी और नक्षत्र और लोगों की हथेलियाँ पढ़ सकने वाले, लोगों की हथेलियाँ, चेहरे और जन्मतिथियाँ देखकर यह बता सकते हैं कि उन पर विपत्ति कब टूटेगी, और दुर्भाग्य उन पर कब बरसेगा—ये चीजें पहले से पूर्व-निर्धारित हैं। तो जब कोई बीमार होता है, तो ऐसा लग सकता है कि यह थकान, क्रोध-भाव या गरीबी और कुपोषण के कारण हुआ—ऊपर से ऐसा लग सकता है। यह स्थिति सब पर लागू होती है, तो फिर एक ही आयु-वर्ग के कुछ लोगों को यह रोग क्यों होता है, जबकि दूसरों को नहीं होता? क्या भाग्य में ऐसा लिखा है? (हाँ।) आम आदमी की भाषा में यह भाग्य में लिखा है। हम इसे उन शब्दों में कैसे कह सकते हैं जो सत्य के अनुरूप हैं? ये सब प्रभु की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन हैं। इसलिए तुम्हारा खाना-पीना, घर और जीने का माहौल चाहे जैसे हों, इनका तुम कब बीमार पड़ोगे और तुम्हें कौन-सा रोग होगा, इससे कोई लेना-देना नहीं है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे हमेशा वस्तुपरक दृष्टिकोण से कारण ढूँढ़ते हैं, और हमेशा यह कहकर बीमारी के कारणों पर जोर देते हैं, “तुम्हें ज्यादा व्यायाम करना चाहिए, ज्यादा साग-सब्जियां और कम माँस खाना चाहिए।” क्या सचमुच ऐसा ही है? जो लोग कभी भी माँस नहीं खाते, उन्हें भी उच्च रक्तचाप और मधुमेह हो सकता है, और शाकाहारियों का भी कोलेस्ट्रोल बढ़ सकता है। आयुर्विज्ञान ने इन चीजों के लिए कोई सही और वाजिब स्पष्टीकरण नहीं दिया है। मेरी बात सुनो, परमेश्वर ने जो विविध भोजन मनुष्य के लिए रचे हैं, वे मनुष्य के खाने के लिए हैं; बस इन्हें ज्यादा नहीं, संयम से खाओ। अपनी सेहत की देखभाल का तरीका सीखना जरूरी है, लेकिन हमेशा बीमारी की रोकथाम के बारे में पढ़ते रहना गलत है। जैसा हमने अभी कहा, किसी की सेहत किस उम्र में कैसी रहेगी और क्या उसे कोई बड़ा रोग होगा, ये सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं। गैर-विश्वासी परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते और वे हथेलियाँ, जन्मतिथियाँ और चेहरे दिखाकर ये बातें जानने के लिए किसी को ढूँढ़ते फिरते हैं, और वे इन बातों पर यकीन करते हैं। तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अक्सर सत्य पर धर्मोपदेश और संगतियाँ सुनते हो, फिर अगर तुम उनमें विश्वास न रखो, तो तुम एक छद्म-विश्वासी के सिवाय कुछ नहीं हो। अगर तुम सच में मानते हो कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथ में है, तो तुम्हें विश्वास करना होगा कि ये चीजें—गंभीर रोग, बड़े रोग, मामूली रोग, और सेहत—सभी परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन हैं। किसी गंभीर रोग का आना और किसी खास उम्र में किसी की सेहत कैसी रहती है, ये संयोग से नहीं होते, और इसे समझना एक सकारात्मक और सही समझ रखना है। क्या यह सत्य के अनुरूप है? (हाँ।) यह सत्य के अनुरूप है, यही सत्य है, तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए, और इस मामले में तुम्हारा रवैया और सोच परिवर्तित होना चाहिए। इन चीजों के परिवर्तित हो जाने के बाद कौन-सी चीज दूर हो जाती है? क्या संताप, व्याकुलता और चिंता की तुम्हारी भावनाएँ दूर नहीं हो जातीं? कम-से-कम, रोग को लेकर संताप, व्याकुलता और चिंता की तुम्हारी नकारात्मक भावनाएँ सैद्धांतिक रूप से तो दूर हो ही जाती हैं। चूँकि तुम्हारी समझ ने तुम्हारे विचारों और सोच को परिवर्तित कर दिया है, इसलिए यह तुम्हारी नकारात्मक भावनाओं को दूर कर देता है। यह एक पहलू है : कोई बीमार पड़ेगा या नहीं, उसे कौन-सा गंभीर रोग होगा, और जीवन के प्रत्येक चरण में उसकी सेहत कैसी होगी, उसे मनुष्य अपनी इच्छा से नहीं बदल सकता, बल्कि ये सब परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित होते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मैं बीमार न पड़ना चाहूँ, तो क्या यह ठीक है? क्या यह ठीक है कि मैं परमेश्वर से रोग दूर कर देने की विनती करूँ? क्या यह ठीक है कि मैं परमेश्वर से इस विपत्ति और दुर्भाग्य से मुझे बाहर निकाल देने को कहूँ?” तुम क्या सोचते हो? क्या ये चीजें ठीक हैं? (नहीं।) तुम यह बात इतनी निश्चितता से कह रहे हो, मगर कोई भी इन चीजों को स्पष्टता से नहीं समझ पा रहा है। शायद कोई वफादारी से अपना कर्तव्य निभा रहा है, उसमें सत्य का अनुसरण करने का दृढ़ संकल्प है, वह परमेश्वर के घर में किसी कार्य के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है, और संभवतः परमेश्वर उसके कर्तव्य, उसके कार्य, उसकी शारीरिक ऊर्जा और शक्ति को प्रभावित करने वाले इस गंभीर रोग को उससे दूर कर देता है, क्योंकि परमेश्वर अपने कार्य की जिम्मेदारी उठाता है। लेकिन क्या ऐसा कोई व्यक्ति है? ऐसा कौन है? तुम नहीं जानते, है न? शायद ऐसे लोग हैं। अगर सचमुच ऐसे लोग होते, तो क्या परमेश्वर उनके रोगों और दुर्भाग्य को सिर्फ एक वचन से दूर नहीं कर देता? क्या परमेश्वर यह सिर्फ एक विचार से करने में समर्थ नहीं होता? परमेश्वर विचार करेगा : “इस व्यक्ति को इस उम्र में, इस महीने में एक रोग होगा। वह फिलहाल अपने कार्य में बहुत व्यस्त है, तो उसे यह बीमारी नहीं होगी। उसे इस बीमारी का अनुभव करने की जरूरत नहीं। इसे उसके पास से गुजर जाने दो।” ऐसा न होने का कोई कारण नहीं है, और इसके लिए परमेश्वर से सिर्फ एक वचन की जरूरत होगी, है ना? लेकिन ऐसा आशीष कौन पा सकेगा? जिस किसी में ऐसा दृढ़ संकल्प और वफादारी होगी और जो परमेश्वर के कार्य में यह काम कर सके, वैसे ही व्यक्ति के लिए ऐसा आशीष पाना संभव होगा। हमें इस विषय पर बात करने की जरूरत नहीं है, इसलिए हम फिलहाल इस बारे में चर्चा नहीं करेंगे। हम रोग के बारे में चर्चा कर रहे हैं; यह ऐसी चीज है जिसका ज्यादातर लोग अपने जीवन में अनुभव करेंगे। इसलिए, लोगों के शरीरों को कैसा रोग, किस वक्त, किस उम्र में पकड़ेगा, और उनकी सेहत कैसी होगी, ये सारी चीजें परमेश्वर व्यवस्थित करता है और लोग इन चीजों का फैसला खुद नहीं कर सकते; उसी तरह जैसे लोग अपने जन्म का समय स्वयं तय नहीं कर सकते। तो क्या जिन चीजों के बारे में तुम फैसला नहीं ले सकते, उनको लेकर तुम्हारा संतप्त, व्याकुल और चिंतित होना बेवकूफी नहीं है? (हाँ, है।) लोगों को उन चीजों को सुलझाने में लगना चाहिए जिन्हें वे खुद सुलझा सकें, और जो चीजें वे नहीं सुलझा सकते, उनके लिए उन्हें परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए; लोगों को चुपचाप समर्पण करना चाहिए, और परमेश्वर से उनकी रक्षा करने की विनती करनी चाहिए—लोगों की मनःस्थिति ऐसी ही होनी चाहिए। जब रोग सचमुच जकड़ ले और मृत्यु सचमुच करीब हो, तो लोगों को समर्पण कर देना चाहिए, परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत या विद्रोह नहीं करना चाहिए, परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए या उस पर हमला करने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए। इसके बजाय, लोगों को सृजित प्राणियों की तरह परमेश्वर से आने वाली हर चीज का अनुभव कर उसकी सराहना करनी चाहिए—उन्हें अपने लिए चीजों को खुद चुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह तुम्हारे जीवन को संपन्न करने वाला एक विशिष्ट अनुभव होना चाहिए, और यह अनिवार्य रूप से कोई बुरी चीज नहीं है, है ना? इसलिए रोग की बात आने पर, लोगों को पहले रोग के उद्गम से जुड़े अपने गलत विचारों और सोच को ठीक करना चाहिए, और तब उन्हें उसकी चिंता नहीं होगी; इसके अलावा लोगों को ज्ञात-अज्ञात चीजों का नियंत्रण करने का कोई हक नहीं है, न ही वे उन्हें नियंत्रित करने में सक्षम हैं, क्योंकि ये तमाम चीजें परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं। लोगों के पास जो अभ्यास का सिद्धांत और रवैया होना चाहिए, वह प्रतीक्षा और समर्पण का है। समझने से लेकर अभ्यास करने तक, सब-कुछ सत्य सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए—यह सत्य का अनुसरण करना है।
— 'वचन देह में प्रकट होता है, खंड 6' से
कुछ लोग यह कहते हुए अपने रोग को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं, “मेरा रोग बढ़ गया तो क्या मैं सह पाऊँगा? अगर मेरी हालत बिगड़ गई तो क्या मैं मर जाऊँगा? क्या मुझे ऑपरेशन करवाना पड़ेगा? अगर मेरा ऑपरेशन हुआ, तो कहीं मैं ऑपरेशन टेबल पर मर न जाऊँ? मैंने समर्पण कर दिया है। क्या इस रोग के चलते परमेश्वर मेरे प्राण ले लेगा?” ये बातें सोचने का क्या तुक है? अगर तुम ये बातें सोचे बिना नहीं रह सकते, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। खुद पर भरोसा करना बेकार है, तुम इसे सहन करने में बिल्कुल असमर्थ रहोगे। कोई भी नहीं चाहता कि उसे रोग हो, और बीमार पड़ने पर कोई भी मुस्कुराता नहीं, बहुत खुश होकर उत्सव नहीं मनाता। ऐसा कोई भी नहीं है क्योंकि यह सामान्य मानवता नहीं है। आम लोग बीमार होने पर हमेशा कष्ट में डूबे रहकर उदास हो जाते हैं, और उनके सहन करने की एक सीमा होती है। वैसे एक बात ध्यान देने की है : अगर लोग बीमार पड़ने पर बीमारी से छुटकारा पाकर बच निकलने के लिए हमेशा अपनी शक्ति पर निर्भर रहने की सोचें, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? अपने रोग के साथ क्या वे और ज्यादा कष्ट नहीं झेलेंगे, और ज्यादा उदास नहीं हो जाएँगे? इसलिए लोग रोग से जितना ज्यादा घिरे हुए हों, उतना ही उन्हें परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए सत्य और अभ्यास करने का मार्ग खोजना चाहिए। लोग जितना ज्यादा बीमारी से घिरे हुए हों, उतना ही उन्हें परमेश्वर के समक्ष आकर अपनी भ्रष्टता और परमेश्वर से की जाने वाली अपने नावाजिब माँगों को जानना चाहिए। तुम बीमारी से जितने ज्यादा घिरे हुए हो, उतनी ही ज्यादा तुम्हारी सच्चे समर्पण की परख होती है। इसलिए, बीमार पड़ने पर, परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित रहने और अपनी शिकायतों और नावाजिब माँगों के खिलाफ विद्रोह करने की तुम्हारी काबिलियत दिखाती है कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो सचमुच सत्य का अनुसरण कर परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है, तुम गवाही देते हो, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण सच्चा है और परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकता है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण महज नारेबाजी और सिद्धांत नहीं हैं। बीमार होने पर लोगों को इस बात पर अमल करना चाहिए। जब तुम बीमार पड़ते हो, तो यह तुम्हारी नावाजिब माँगों और परमेश्वर के प्रति अवास्तविक कल्पनाओं और धारणाओं का खुलासा करने के लिए होता है, यह परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और उसके प्रति समर्पण की परीक्षा लेने के लिए भी होता है। अगर तुम इन चीजों की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हो, तो तुम्हारे पास परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और उसके प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण की सच्ची गवाही और असली प्रमाण है। परमेश्वर यही चाहता है, एक सृजित प्राणी के पास यह होना चाहिए और उसे इसे जीना चाहिए। क्या ये सारी चीजें सकारात्मक नहीं हैं? (जरूर हैं।) लोगों को इन सभी चीजों का अनुसरण करना चाहिए। इसके अलावा, अगर परमेश्वर तुम्हें बीमार पड़ने देता है, तो क्या वह कभी भी कहीं भी तुमसे तुम्हारा रोग ले नहीं सकता? (जरूर ले सकता है।) परमेश्वर कभी भी कहीं भी तुम्हारा रोग तुमसे ले सकता है, तो क्या वह ऐसा नहीं कर सकता कि तुम्हारा रोग तुममें बना रहे और तुम्हें कभी न छोड़े? (जरूर कर सकता है।) अगर परमेश्वर ऐसा कुछ करता है कि यह रोग तुम्हें कभी न छोड़े, तो क्या तब भी तुम अपना कर्तव्य निभा पाओगे? क्या तुम परमेश्वर में अपनी आस्था रख पाओगे? क्या यह परीक्षा नहीं है? (हाँ है।) अगर तुम बीमार पड़कर कई महीने बाद ठीक हो जाओ, तो परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और उसके प्रति तुम्हारी वफादारी और समर्पण की परीक्षा नहीं होती, और तुम्हारे पास कोई गवाही नहीं होती। कुछ महीने तक रोग सहना आसान है, लेकिन अगर तुम्हारा रोग दो-तीन साल चले, और तुम्हारी आस्था और परमेश्वर के प्रति वफादार और समर्पित बने रहने की तुम्हारी कामना बदलने के बजाय और सच्ची हो जाए, तो क्या यह नहीं दिखाता कि तुम जीवन में विकसित हो चुके हो? क्या तुम्हें इसका फल नहीं मिलेगा? (हाँ।) तो सत्य का सच्चा अनुसरण करने वाला कोई व्यक्ति बीमार होने पर अपने रोग से आए विविध लाभों से गुजर कर उनका खुद अनुभव करता है। वह व्याकुल होकर अपने रोग से बच निकलने की कोशिश नहीं करता, न ही चिंता करता है कि रोग के लंबा खिंचने पर नतीजा क्या होगा, उसके कारण कौन-सी समस्याएँ पैदा होंगी, कहीं रोग बदतर तो नहीं हो जाएगा, या कहीं वह मर तो नहीं जाएगा—वह ऐसी चीजों के बारे में चिंता नहीं करता। ऐसी चीजों की चिंता न करने के साथ-साथ ऐसे लोग सकारात्मक रुख रख पाते हैं, परमेश्वर में सच्ची आस्था रखकर उसके प्रति समर्पित और वफादार रह पाते हैं। इस तरह अभ्यास करके, वे गवाही हासिल कर पाते हैं, यह उन्हें उनके जीवन-प्रवेश और स्वभावगत परिवर्तन में बड़ा लाभ प्रदान करता है, और यह उनकी उद्धार-प्राप्ति की ठोस बुनियाद बना देता है। यह कितना अद्भुत है! इसके अलावा, रोग बड़ा भी हो सकता है और छोटा भी। मगर चाहे यह छोटा हो या बड़ा, हमेशा लोगों को शुद्ध करता है। किसी रोग से गुजर कर लोग परमेश्वर में अपनी आस्था नहीं खोते, वे समर्पित होते हैं, शिकायत नहीं करते, उनका व्यवहार बुनियादी तौर पर स्वीकार्य होता है, और फिर रोग के चले जाने के बाद उन्हें कुछ लाभ मिलते हैं, वे बड़ी खुशी महसूस करते हैं—साधारण बीमारी का सामना करने के बाद लोगों के साथ ऐसा ही होता है। वे ज्यादा लंबे समय तक बीमार नहीं रहते, और उसे सहने में समर्थ होते हैं, और बुनियादी तौर पर यह रोग सहने में वे सक्षम होते हैं। लेकिन कुछ रोग ऐसे होते हैं, जो कुछ समय इलाज से बेहतर होने के बावजूद दोबारा हो जाते हैं, और बदतर हो जाते हैं। ऐसा बार-बार होता है, जब तक कि आखिर रोग इस हद तक बढ़ जाता है कि उसका इलाज नहीं हो सकता, और आधुनिक चिकित्सा में उपलब्ध कोई साधन काम नहीं आता। रोग किस हद तक पहुँच जाता है? यह उस हद तक पहुँच जाता है कि बीमार व्यक्ति कभी भी कहीं भी मर सकता है। यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति का जीवन सीमित है। यह वह समय नहीं है जब वह बीमार न हो और मृत्यु उससे बहुत दूर हो, और उसका कोई अंदेशा नहीं है, मगर इसके बजाय व्यक्ति को आभास हो जाता है कि उसकी मृत्यु का दिन करीब है, और मृत्यु उसके सामने है। मृत्यु का सामना किसी व्यक्ति के जीवन का सबसे मुश्किल और सबसे अहम पल होता है। तो तुम क्या करते हो? जो लोग संतप्त, व्याकुल और चिंतित रहते हैं, वे अपनी मृत्यु को लेकर निरंतर व्याकुल, संतप्त और चिंतित महसूस करते हैं, जब तक कि उनके जीवन की सबसे मुश्किल घड़ी नहीं आ जाती, और जिस चीज को लेकर वे व्याकुल, संतप्त और चिंतित हैं, वह आखिरकार सच्चाई बन जाती है। वे मृत्यु से जितना डरते हैं, उतनी ही वह उनके करीब आती है, और वे इतनी जल्दी न मरना चाहें तो भी मृत्यु उन पर अप्रत्याशित हमला कर देती है। वे क्या कर सकते हैं? क्या वे मृत्यु से दूर भागने की कोशिश करें, मृत्यु को खारिज कर दें, उसका विरोध करें, उसके बारे में शिकायत करें, या परमेश्वर से सौदा करने की कोशिश करें? इनमें से कौन-सा तरीका काम आएगा? कोई भी काम नहीं आएगा, और उनका संताप और व्याकुलता बेकार है। जब वे अपनी मृत्यु की घड़ी पर पहुँच जाते हैं, तो उनके लिए सबसे दुख की बात क्या होती है? उन्हें सूअर का लाल भुना माँस खाना बहुत पसंद था, मगर पिछले कुछ साल से उन्होंने इसे ज्यादा नहीं खाया, उन्होंने बहुत कष्ट सहे और अब उनका जीवन खत्म होने को है। वे सूअर के लाल भुने माँस को याद कर उसे फिर से खाना चाहते हैं, लेकिन उनकी सेहत उस लायक नहीं है, वे उसे नहीं खा सकते, उसमें बहुत तेल होता है। उन्हें सुंदर और आकर्षक ढंग से तैयार होना और बढ़िया कपड़े पहनना पसंद था। अब वे मरनेवाले हैं, वे अपनी भरी आलमारी में सजे वस्त्र बस देख सकते हैं, एक भी पहन नहीं सकते। मृत्यु कितनी दुखदाई होती है! मृत्यु सबसे ज्यादा दर्दनाक चीज है, और जब वे इस बारे में सोचते हैं, तो लगता है जैसे कोई उनके दिल को छुरा घुमा-घुमा कर छलनी कर रहा हो, और उनके पूरे शरीर की तमाम हड्डियाँ लुगदी बन गई हों। मृत्यु के बारे में सोचकर उन्हें दुख होता है, वे रोना चाहते हैं, बिलखना चाहते हैं, और वे सचमुच रोते-बिलखते हैं, और आहत होते हैं कि वे अब मरनेवाले हैं। वे सोचते हैं, “मैं क्यों नहीं मरना चाहता? मैं मृत्यु से इतना डरता क्यों हूँ? पहले जब मैं गंभीर रूप से बीमार नहीं था, मुझे मृत्यु भयावह नहीं लगती थी। कौन मृत्यु का सामना नहीं करता? कौन नहीं मरता? तो चलो मैं मर ही जाता हूँ! उस बारे में अब सोचता हूँ, तो यह कहना उतना आसान नहीं है, और जब मृत्यु सच में आ जाती है, तो उसका समाधान करना उतना आसान नहीं होता। मुझे इतना दुख क्यों हो रहा है?” क्या तुम मृत्यु के बारे में सोचकर दुखी होते हो? जब भी तुम मृत्यु के बारे में सोचते हो, दुख और पीड़ा का अनुभव करते हो, और यह चीज जो तुम्हें सबसे ज्यादा व्याकुल और चिंतित करती है वह आखिरकार आ जाती है। इसलिए, तुम इस तरह जितना ज्यादा सोचते हो, उतना ही भयभीत और बेबस होते हो, उतना ही कष्ट सहते हो। तुम्हारा दिल बेआराम है, और तुम मरना नहीं चाहते। मृत्यु के इस मामले को कौन सुलझा सकता है? कोई भी नहीं, और निश्चित रूप से तुम खुद तो इसे सुलझा ही नहीं सकते। तुम मरना नहीं चाहते, तो फिर क्या कर सकते हो? तुम्हें मरना तो पड़ेगा ही, कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता। मृत्यु लोगों को घेर लेती है; वे दिल से मरना नहीं चाहते, मगर बस हमेशा मृत्यु के बारे में ही सोचते हैं, क्या यह उनके सचमुच मरने से पहले ही मर जाने का मामला नहीं है? क्या वे सचमुच मर सकते हैं? कौन यह पक्के तौर पर कहने की हिम्मत कर सकता है कि वह कब मरेगा या उसकी मृत्यु किस वर्ष होगी? कौन ये बातें जान सकता है? कुछ लोग कहते हैं, “मैंने अपना भविष्य पढ़वा लिया है, मैं अपनी मृत्यु का वर्ष, माह और दिन जानता हूँ, यह भी जानता हूँ कि मेरी मृत्यु कैसी होगी।” क्या तुम इसे पक्के तौर पर कह सकते हो? (नहीं।) तुम इसे पक्के तौर पर नहीं कह सकते। तुम्हें नहीं मालूम तुम कब मरोगे—यह गौण बात है। अहम बात यह है कि जब तुम्हारा रोग तुम्हें सचमुच मौत की दहलीज पर ले आए, तब तुम कौन-सा रवैया अपनाओगे। इस प्रश्न पर तुम्हें चिंतन कर सोचना चाहिए। क्या तुम मृत्यु का सामना समर्पण के रवैये के साथ करोगे, या मृत्यु को तुम प्रतिरोध, अस्वीकृति या अनिच्छा के रवैये से देखोगे? तुम्हारा रवैया क्या होना चाहिए? (समर्पण का रवैया।) सिर्फ कह देने भर से यह समर्पण प्राप्त नहीं हो सकता, व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। तुम यह समर्पण कैसे प्राप्त कर सकते हो? स्वेच्छा से समर्पण प्राप्त करने से पहले तुम्हें कैसी समझ की जरूरत है? यह सरल नहीं है, है न? (नहीं, यह सरल नहीं है।) तो बताओ तुम्हारे दिल में क्या है? (अगर मैं गंभीर रूप से बीमार हो जाऊँ, तो सोचूँगा कि अगर मैं सचमुच मर भी जाऊँ, तो यह परमेश्वर के संप्रभुता के अधीन और उसके द्वारा व्यवस्थित किया गया होगा। मनुष्य इतनी गहराई से भ्रष्ट हो चुका है कि अगर मेरी मृत्यु हो जाए, तो परमेश्वर की धार्मिकता से होगी। ऐसा नहीं है कि मुझे जीवित रहना ही चाहिए; मनुष्य परमेश्वर से ऐसी माँग करने योग्य नहीं है। इसके अलावा, मेरे ख्याल से अब चूँकि मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, इसलिए चाहे जो हो जाए, मैंने जीवन का सही मार्ग देख लिया है, अनेक सत्य समझ लिए हैं, कि मैं जल्दी मर भी गया तो यह सार्थक होगा।) क्या ऐसा सोचना सही है? क्या यह कोई खास समर्थक सिद्धांत बनाता है? (जरूर बनाता है।) और कौन बोलना चाहता है? (हे परमेश्वर, अगर किसी दिन मैं सचमुच बीमार हो गया, और शायद मेरी मृत्यु हो जाए, तो वैसे भी मृत्यु से बच पाने का कोई तरीका नहीं है। यह परमेश्वर का पूर्वनिर्धारण और संप्रभुता है, मैं चाहे जितनी फिक्र या चिंता करूँ, कोई फायदा नहीं। अपना बचा-कुचा समय मुझे इस बात पर ध्यान देने में लगाना चाहिए कि अपना कर्तव्य मैं अच्छे से कैसे निभाऊँ। अगर मैं सचमुच मर भी गया, तो भी मुझे कोई पछतावा नहीं होगा। बिल्कुल अंत में परमेश्वर और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाना भय और आतंक में जीने से बेहतर है।) इस समझ के बारे में तुम्हारी क्या सोच है? क्या यह थोड़ी बेहतर नहीं है? (हाँ।) सही है, मृत्यु के विषय को तुम्हें इसी तरह लेना चाहिए। सभी को इस जीवन में मृत्यु का सामना करना होगा, यानी अपनी जीवनयात्रा के अंत में सबको मृत्यु का सामना करना होगा। लेकिन मृत्यु की बहुत-सी तरह-तरह की खासियतें हैं। उनमें से एक यह है कि परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित समय पर तुम अपना उद्देश्य पूरा कर लेते हो, परमेश्वर तुम्हारे दैहिक जीवन के नीचे एक लकीर खींच देता है, और तुम्हारा दैहिक जीवन समाप्त हो जाता है, हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारा जीवन खत्म हो गया है। जब कोई व्यक्ति बिना शरीर का हो, तो उसका जीवन समाप्त हो जाता है—क्या बात ऐसी ही है? (नहीं।) मृत्यु के बाद जिस रूप में तुम्हारे जीवन का अस्तित्व होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जीवित रहते समय, तुमने परमेश्वर के कार्य और वचनों के साथ कैसा बर्ताव किया—यह बहुत महत्वपूर्ण है। मृत्यु के बाद तुम्हारा अस्तित्व जिस रूप में होता है, या तुम्हारा अस्तित्व होगा भी या नहीं, यह जीवित रहते समय परमेश्वर और सत्य के प्रति तुम्हारे रवैये पर निर्भर करेगा। अगर जीवित रहते हुए मृत्यु और हर तरह के रोगों का सामना करने पर सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया विद्रोह, विरोध करने और सत्य से विमुख होने का हो, तो तुम्हारे दैहिक जीवन की समाप्ति का वक्त आने पर मृत्यु के बाद तुम किस रूप में अस्तित्व में रहोगे? तुम पक्के तौर पर किसी दूसरे रूप में रहोगे, और तुम्हारा जीवन निश्चित रूप से जारी नहीं रहेगा। इसके विपरीत, अगर जीवित रहते हुए, तुम्हारे शरीर में जागरूकता होने पर, सत्य और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया समर्पण और वफादारी का हो और तुम सच्ची आस्था रखते हो, तो भले ही तुम्हारा दैहिक जीवन समाप्त हो जाए, तुम्हारा जीवन किसी और संसार में एक अलग रूप धारण कर अस्तित्व में बना रहेगा। मृत्यु का यह एक स्पष्टीकरण है। एक और भी बात ध्यान देने की है, और वह यह है कि मृत्यु के विषय की प्रकृति वही है जो दूसरे विषयों की होती है। इसका चयन लोग खुद नहीं कर सकते, और इसे मनुष्य की इच्छा से बदलना तो दूर की बात है। मृत्यु भी जीवन की किसी दूसरी महत्वपूर्ण घटना जैसी ही है : यह पूरी तरह से सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण और संप्रभुता के अधीन है। अगर कोई मृत्यु की भीख माँगे, तो जरूर नहीं कि वह मर जाए; अगर कोई जीने की भीख माँगे, तो जरूरी नहीं कि वह जीवित रहे। ये सब परमेश्वर की संप्रभुता और पूर्वनिर्धारण के अधीन हैं, और परमेश्वर के अधिकार, उसके धार्मिक स्वभाव और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं से ही इसे बदला जा सकता है। इसलिए, मान लो कि तुम्हें कोई गंभीर रोग, संभावित घातक गंभीर रोग हो जाता है, तो जरूरी नहीं कि तुम्हारी मृत्यु हो जाए—तुम मरोगे या नहीं इसका फैसला कौन करता है? (परमेश्वर।) परमेश्वर फैसला लेता है। और चूँकि परमेश्वर निर्णय लेता है, और लोग ऐसी चीज का फैसला नहीं कर सकते, तो लोग किस बात को लेकर व्याकुल और संतप्त हैं? यह ऐसा ही है, जैसे तुम्हारे माता-पिता कौन हैं, तुम कब और कहाँ पैदा होते हो—ये चीजें भी तुम नहीं चुन सकते। इन मामलों में सबसे बुद्धिमान यह चुनाव है कि चीजों को कुदरती ढंग से होने दिया जाए, समर्पण किया जाए, चुना न जाए, इस विषय पर कोई विचार न किया जाए या ऊर्जा न खपाई जाए, और इसे लेकर संतप्त, व्याकुल और चिंतित न हुआ जाए। चूँकि लोग खुद नहीं चुन सकते, इसलिए इस विषय पर इतनी ऊर्जा और विचार खपाना बेवकूफी और अविवेकपूर्ण है। मृत्यु के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय का सामना करते समय लोगों को संतप्त नहीं होना चाहिए, फिक्र नहीं करनी चाहिए और डरना नहीं चाहिए, फिर क्या करना चाहिए? लोगों को प्रतीक्षा करनी चाहिए, है ना? (हाँ।) सही? क्या प्रतीक्षा का अर्थ मृत्यु की प्रतीक्षा करना है? मृत्यु सामने होने पर मृत्यु की प्रतीक्षा करना? क्या यह सही है? (नहीं, लोगों को सकारात्मक होकर इसका सामना करना चाहिए, समर्पण करना चाहिए।) यह सही है, इसका अर्थ मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं है। मृत्यु से बुरी तरह भयभीत मत हो, अपनी पूरी ऊर्जा मृत्यु के बारे में सोचने में मत लगाओ। सारा दिन यह मत सोचते रहो, “क्या मैं मर जाऊँगा? मेरी मृत्यु कब होगी? मरने के बाद क्या करूँगा?” बस, इस बारे में मत सोचो। कुछ लोग कहते हैं, “इस बारे में क्यों न सोचूँ? जब मरने ही वाला हूँ, तो क्यों न सोचूँ?” चूँकि यह नहीं मालूम कि तुम्हारी मृत्यु होगी या नहीं, और यह भी नहीं मालूम कि परमेश्वर तुम्हें मरने देगा या नहीं—ये चीजें अज्ञात हैं। खास तौर से यह मालूम नहीं है कि तुम कब मरोगे, कहाँ मरोगे, किस वक्त मरोगे और मरते समय तुम्हारे शरीर को क्या अनुभव होगा। जो चीजें तुम नहीं जानते, उनके बारे में सोचकर और चिंतन कर अपने दिमाग को झकझोरने और उनके बारे में व्याकुल और चिंतित होना क्या मूर्खता नहीं है? चूँकि ऐसा करके तुम मूर्ख बन जाते हो, इसलिए तुम्हें इन चीजों पर अत्यधिक नहीं सोचना चाहिए।
— 'वचन देह में प्रकट होता है, खंड 6' से
